भिलाई। जिन 5 राज्यों में वर्षांत तक चुनाव होने हैं, उनमें भाजपा के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द छत्तीसगढ़ ही है। भले ही कांग्रेस यहां सामूहिक नेतृत्व से चुनाव लडऩे की बात कह रही हो, लेकिन राज्य में कांग्रेस का चेहरा सीएम भूपेश बघेल ही होंगे। भाजपा में सीएम के लिए किसी एक चेहरे को सामने लाने से असंतोष उभरने का खतरा है, इसलिए पार्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ सकती है। वैसे, छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सीएम बघेल ही हैं। कांग्रेस की नीतियां, खासकर छत्तीसगढिय़ावाद का उसके पास कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में भाजपा पर चुनावी मुद्दे भी इसी आधार पर तय करने का दबाव है। इस लिहाज से देखें तो छत्तीसगढिय़ा दाऊ, प्रधानमंत्री मोदी पर भारी पड़ते दिखते है।
पिछले दिनों अमित शाह ने चुनाव तैयारियों को लेकर समीक्षा की थी। इस दौरान उन्होंने बेहतर कार्ययोजना के साथ प्रदेश में सरकार बनाने का फार्मूला दिया। पार्टी सूत्रों की मानें तो इसमें यह बात भी स्पष्ट हुई कि राजस्थान और मध्यप्रदेश के मुकाबले भाजपा के लिए छत्तीसगढ़ ज्यादा बड़ी चुनौती है। राजनीतिक प्रेक्षकों की माने तो भाजपा के लिए आदिवासी सीटों पर स्थितियां ज्यादा संघर्षपूर्ण है। आंतरिक सर्वेक्षण के अनुसार पार्टी को बस्तर और सरगुजा की 29 आदिवासी सीटों पर अधिक मजबूत पकड़ बनाने की जरूरत है। 2018 के चुनाव में 29 आदिवासी सीटों में भाजपा को केवल तीन सीट मिली थी। बाद में दंतेवाड़ा उपचुनाव में भी भाजपा ने हार मिली। विगत चुनाव में कांग्रेस को 68 तो भाजपा को 15 सीटें मिली थी। वर्तमान में कांग्रेस के पास 71 सीटें हैं, जबकि भाजपा के पास महज 13।
डॉ. रमन के लिए संभावनाएं खत्म?
देश में दो राष्ट्रीय पार्टी बीजेपी और कांग्रेस के दो प्रमुख चेहरे है। बीजेपी से पीएम मोदी का और कांग्रेस से राहुल गांधी का चेहरा हैं। अक्सर देखा जाता है कि बड़े राज्यों को छोड़कर यानी यूपी जैसे राज्यों को छोड़कर बीजेपी मोदी के चेहरे पर ही अधिकांश राज्यों में चुनाव लड़ती है। वहीं छत्तीसगढ़ की बात करें तो राजनीतिक जानकर मान रहे है कि छत्तीसगढ़ में पहले बीजेपी डॉ. रमन सिंह के चेहरे पर चुनाव लड़ती थी, लेकिन इस बार पीएम मोदी के चेहरे पर चुनावी मैदान में उतर रही है। पार्टी नेतृत्व ने डॉ. रमन को संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर उन्हें दिल्ली शिफ्ट कर दिया है। इससे उनके लिए राज्य में भावी संभावनाएं लगभग खत्म हो गई है। कांग्रेस में रणनीति इससे अलग है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस राहुल गांधी नहीं बल्कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी। इसकी घोषणा खुद पीसीसी चीफ दीपक बैज ने संगठन की कमान संभालते हुए ही कर दी थी।
माथुर दे चुके हैं संकेत
भाजपा के सीएम चेहरे को लेकर हाल ही में प्रदेश प्रभारी ओम माथुर ने बिलासपुर में बयान दिया था। उनका कहना था कि सीएम फेस का निर्णय ना मैं कर सकता हूं ना यहां की टीम कर सकती है। बीजेपी संगठन आधारित दल है, सिस्टम की पार्टी है. यह किसी व्यक्ति, परिवार या समाज की पार्टी नहीं है. यहां सिस्टम बना हुआ है। सेंट्रल पार्लियामेंट्री बोर्ड यह निर्णय करता है कि चुनाव किस तरह से लड़ा जाए और कौन चेहरा होगा। माथुर के मुताबिक, भाजपा ने कई जगह चेहरा घोषित करके लड़े है तो कई जगह बिना चेहरा घोषित किए भी लड़े है। माथुर के इस बयान के यह निहितार्थ भी निकाले जाते हैं कि छत्तीसगढ़ में किसी स्थानीय चेहरे को सामने लाने की बजाए सर्वस्वीकार्य चेहरे को रखा जाए। साथ ही, बहुमत की स्थिति में सीएम का फैसला दिल्ली से होगा। हालांकि प्रदेश संगठन के मुखिया पर दांव लगाने के भी चर्चे है।
एकजुटता पर जोर
भाजपा के विपरीत कांग्रेस में आपसी सामंजस्य, संतुलन और एकजुटता पर जोर दिया गया है। पिछले एक-डेढ़ महीने के घटनाक्रम से यह संकेत मिलता है कि पिछले चुनाव की ही तरह पार्टी मिल-जुलकर और सामूहिक नेतृत्व से चुनाव लड़ेगी। चेहरा जरूर सीएम भूपेश बघेल का होगा। चुनाव से पहले पार्टी नेताओं के आपसी मतभेद दूर करने की पहल हुई। नतीजतन टीएस सिंहदेव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। फिर सत्ता और संगठन में संतुलन बरकरार रखने के लिए कई निर्णय लिए गए। इसके तहत मोहन मरकाम की जगह दीपक बैज को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, जबकि मरकाम को केबिनेट मंत्री की शपथ दिलाई गई। अंत में सभी ने मिलकर यह संदेश दिया कि राज्य में पार्टी पूरी तरह से एकजुट है। हालांकि इन मामले में कुछ हस्तक्षेप कांग्रेस हाईकमान को भी करना पड़ा। किन्तु इसके पीछे भी सीएम भूपेश बघेल की ही पहल थी।
सर्वे रिपोर्टों से दोनों दल उत्साहित
हाल में कई तरह के सर्वे हुए और इन सर्वे की रिपोर्टों से न केवल कांग्रेस बल्कि भाजपा में भी उत्साह है। सर्वे में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिलते दिखाया व बताया गया है, लेकिन भाजपा को भी बहुमत से ज्यादा दूर नहीं बताया गया है। शायद यही वजह है कि भाजपा आलाकमान चाहता है कि प्रदेश संगठन और यहां के नेता उन सीटों पर ज्यादा फोकस करें जहां कम मार्जिन से फैसले हुए थे। इन सीटों की संख्या करीब 4 दर्जन बताई जा रही है। यदि भाजपा इसे रिकवर कर पाई तो उसके लिए सत्ता हासिल करना बेहद आसान हो जाएगा। फिलहाल भाजपा का पूरा जोर 46 सीटों पर है। दूसरी ओर कांग्रेस में इस बार कई कड़े फैसले लिए जाने के संकेत मिल रहे हैं। पार्टी में विधायकों के टिकट काटने की परंपरा आमतौर पर नहीं है, लेकिन इस बार जो संकेत मिल रहे हैं, उसके मुताबिक, दर्जनभर से ज्यादा विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं।




