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गुस्ताखी माफ: एमबीबीएस डाक्टरों की सप्लाई बढ़ाने पर जोर

By @dmin
Published: September 4, 2022
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गुस्ताखी माफ़: रायपुर के 'हैप्पी स्ट्रीट' और भिलाई की 'तफरी'
गुस्ताखी माफ़: रायपुर के 'हैप्पी स्ट्रीट' और भिलाई की 'तफरी'
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-दीपक रंजन दास
अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि जब किसी वस्तु की सप्लाई बढ़ाई जाती है तो उसकी कीमत कम होने लगती है. शायद इसलिए अब चिकित्सकों की सप्लाई बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. छत्तीसगढ़ में इसी सत्र से दो और मेडिकल कॉलेज खुल जाएंगे जिससे 200 अतिरिक्त सीटों पर एमबीबीएस के लिए प्रवेश दिया जा सकेगा. इसके साथ ही प्रदेश में प्रतिवर्ष एमबीबीएस में दाखिला लेने वालों की संख्या 1620 हो जाएगी. यानी पांच-छह साल बाद प्रतिवर्ष 1500 एमबीबीएस डाक्टर प्रदेश को मिलने लगेंगे. इनमें से 1120 सीटें सरकारी मेडिकल कालेजों में हैं जहां से विद्यार्थी कम खर्च में मेडिकल की पढ़ाई करके बाहर आएंगे. शहरों में अस्पतालों और डाक्टरों की काफी भीड़ है. सप्लाई बढऩे से इन्हें अब गांवों का रुख करना होगा. उम्मीद है कि इससे सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी को पूरा किया जा सकेगा. इसका लाभ ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों को भी मिलेगा. एमबीबीएस डाक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी तो झोला छाप डाक्टरों की संख्या स्वयमेव कम होती चली जाएगी. पर स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाना इतना भी आसान नहीं है. दो दशक पहले क्लिनिकों की बाढ़ आ गयी थी तो उसकी जगह अस्पतालों ने लेना प्रारंभ कर दिया. नर्सिंग होम्स की संख्या बढ़ी तो मल्टी स्पेशालिटी और सुपर स्पेशालिटी अस्पतालों ने पैर जमाने शुरू कर दिये. पर डाक्टर को बतौर कंसल्टेंसी फीस मिलता ही क्या है? बड़े शहरों में जहां एक विशेषज्ञ की फीस 1500 रुपए से लेकर 2000 रुपए या उससे भी अधिक है वहीं छत्तीसगढ़ में अधिकतम फीस 400 से 600 रुपए है. लिहाजा अब पूरा जोर डायग्नोस्टिक्स पर होना चाहिए. एमआरआई, सीटी स्कैन और पैथोलॉजी टेस्ट चना मुर्रा हो गये हैं. सरकार यदि वाकई चाहती है कि जनता को राहत मिले तो सबसे पहले तो वह सरकारी डायग्नोस्टिक फैसिलिटी खोले. नहीं खोल सकती तो कम से कम इतना ही कर दे कि आयुष्मान के पैकेज में इसके खर्च को भी शामिल कर दे. अभी होता यह है कि मरीज 15-20 हजार के टेस्ट कराने के बाद 10 हजार के इलाज के लिए अस्पताल में दाखिल होता है. अच्छी खासी रकम खर्च करने के बाद भी उसे फोकटिया मरीज होने की जलालत झेलनी पड़ती है. अच्छा होगा कि सरकार किसी ऐसी बीमा योजना के बारे में सोचे जो कम प्रीमियम पर सामूहिक बीमा का लाभ देश के नागरिकों को दे सके. आखिर बीपीएल-एपीएल राशन कार्ड धारकों से भी सरकार चावल-नमक का कुछ तो पैसा लेती ही है. फिर चिकित्सा को मुफ्त करने की क्या जरूरत आन पड़ी थी. हितग्राही से थोड़े पैसे लेकर आयुष्मान योजना को बेहद मजबूत किया जा सकता है. इससे सबका भला होगा. मरीज, डाक्टर, अस्पताल और डायग्नोस्टिक सेंटर सबकी सेहत सुधरेगी. साथ ही सरकार पीजी की सीटें बढ़ाने पर भी विचार करे क्योंकि अब लोग एमबीबीएस को डाक्टर ही नहीं मानते.

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