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Gustakhi Maaf: शहरों में ईज ऑफ लिविंग का फीडबैक

By Om Prakash Verma
Published: January 10, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
अपना बिलासपुर एक बार फिर सुर्खियों में है. पर इस बार उसकी सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाए गए हैं. मामला देश में चल रहे ईज ऑफ लिविंग के फीडबैक का है. यह सर्वे केन्द्रीय शहरी मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है. इस सर्वे में अधिक अंक लाने की होड़ लगी रहती है. ईज ऑफ लिविंग में अच्छा रैंक आने का मतलब है कि उस शहर में विकास, निवेश, रोजगार सृजन के बेहतर वातावरण है. इस रैंकिंग का शहर को और भी लाभ मिलते हैं. संदेह है कि बिलासपुर को ज्यादा से ज्यादा अंक दिलाने के लिए यहां फर्जी तरीके से एक ही व्यक्ति ने 150-150 तक पाजीटिव फीडबैक दर्ज कराए. इसका अंदाजा इस बात से लगाया गया कि ऐसे फीडबैक एक ही नंबर या आईपी एड्रेस से आए हैं. अब आर्टीफिशल इंटेलिजेंस की मदद से ऐसे फीडबैक को अलग किया जा रहा है. वैसे भी ‘ईज ऑफ लिविंग’ अर्थात जीवन की सुगमता के लिए किये जा रहे सर्वेक्षण में इस फीडबैक का वेटेज केवल 30 प्रतिशत है. केन्द्र सरकार मानकर चलती है कि देश में सबके हाथ में स्मार्ट फोन है. वह यह भी मानकर चल रही है कि सभी को स्मार्ट फोन यूज करना भी आता है. केन्द्र का इस हकीकत से कोई लेना देना नहीं कि दिन भर व्हाट्सअप-फेसबुक-इंस्टाग्राम-ट्विटर खेलने वालों में से 80 फीसदी लोगों ने कभी फोन से ईमेल नहीं किया. ऐसे लोग दूसरों से अपना काम करवाते हैं. आज लगभग सभी मोहल्लों में किसी न किसी बच्चे के पास लैपटॉप जरूर होता है. ऐसे लोगों ने थोक में वहां से अपना फीडबैक डलवाया हो सकता है. ऐसे में आईपी एड्रेस तो सेम-टू-सेम होगा ही. फीडबैक फॉर्म इतना घटिया है कि उसमें मोबाइल नंबर कुछ भी डालो वह ऐक्सेप्ट कर लेता है. आधार नंबर को केन्द्र खुद नहीं मानता. इससे तो अच्छा था भाजपा का सदस्यता अभियान. सदस्यता अभियान के लिए भाजपा ने एक मोबाइल नंबर पर मिस-कॉल देने की व्यवस्था की थी. भाजपा कार्यकर्ता लोगों को एक मोबाइल नंबर देकर उसपर कॉल करने के लिए कहते थे. एक घंटी के बाद नंबर अपने आप कट जाता था. लोग पूछते तक नहीं थे कि यह नंबर किसका है. इस तरह भाजपा देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी हो गई. पर जब से पुलिस ने लोगों को सायबर फ्रॉड के प्रति आगाह किया है, लोग अंजान नंबरों पर कॉल करने से भी बच रहे हैं. नए ऐप डाउनलोड करने या इंस्टाल करने में भी अब उनको डर लगता है. वैसे भी अधिकांश ऐप फोन बुक, कैमरा और अन्य निजी जानकारियों तक पहुंचने की इजाजत मांगती हैं. लोग डर जाते हैं और ऐप को उसके हाल पर छोड़ देते हैं. ऐसे सतर्क लोगों की नियत पर संदेह करना ठीक नहीं है. बेहतर होगा सरकार अपनी यूटोपिया (भ्रम का संसार) छोड़कर बाहर निकले. देश की आम आबादी की भी उससे कुछ अपेक्षाएं हैं.

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