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मुकेश चंद्राकर के पुरखे जमीन नहीं देते तो न भिलाई होता न भिलाई इस्पात संयंत्र!

By Om Prakash Verma Published November 16, 2023
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मुकेश चंद्राकर के पुरखे जमीन नहीं देते तो न भिलाई होता न भिलाई इस्पात संयंत्र!
मुकेश चंद्राकर के पुरखे जमीन नहीं देते तो न भिलाई होता न भिलाई इस्पात संयंत्र!
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मुकेश के समर्थन में नाम वापस लेने वाले वशिष्ठ नारायण मिश्रा ने किया सनसनीखेज खुलासा
भिलाई (श्रीकंचनपथ न्यूज़)। वैशाली नगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी मुकेश चंद्राकर को बाहरी प्रत्याशी बताए जाने के बाद सनसनीखेज खुलासा हुआ है। यह खुलासा और किसी ने नहीं बल्कि वैशाली नगर क्षेत्र से ही चुनाव लडऩे का ऐलान करने और फिर मुकेश चंद्राकर के पक्ष में नाम वापस लेने वाले वशिष्ठ नारायण मिश्रा ने किया है। उन्होंने कहा कि यदि मुकेश चंद्राकर के पुरखे भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए जमीन नहीं देते तो आज न भिलाई होता न ही भिलाई इस्पात संयंत्र। यहां रह रहे ज्यादातर लोग बाहर से आए हुए हैं और मुकेश चंद्राकर के पुरखों द्वारा दी गई जमीन पर ही रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि भिलाई के लोग आज भी मुकेश चंद्राकर परिवार के कर्जदार हैं। इस कर्ज से मुक्त होना है तो सबको मुकेश का साथ देना होगा। इसी कर्ज से उऋण होने के लिए ही उन्होंने इस बार चुनाव में नाम वापस लेकर मुकेश चंद्राकर का समर्थन करने का निर्णय लिया।

वशिष्ठ नारायण मिश्रा ने बताया कि 1885 में जमशेदजी टाटा इस्पात कारखाना खोलने के लिए दल्ली राजहरा आए थे। यहां आने के बाद उन्होंने देखा कि क्षेत्र में खनिज संसाधन भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। लेकिन यहां आने के बाद उन्होंने महसूस किया कि यहां खनिज तो है पर पानी नहीं है। इसके चलते जमशेदजी टाटा ने इस क्षेत्र में इस्पात कारखाना खोलने की अपनी योजना को रद्द किया और कुछ समय बाद जमशेदपुर में इस्पात का कारखाना खोलने का निर्णय लिया। 1904 में उनका कारखाना चालू हो गया और उत्पादन शुरू हुआ। जब भारत आजाद हुआ तो देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत में औद्योगिक क्रांति का सपना देखा। उन्होंने 1955 में तय किया कि खनिज संसाधन से भरपूर इस इलाके में इस्पात का कारखाना खोला जाए। लेकिन पं. नेहरू ने महसूस किया कि कारखाना खोलने के लिए जितनी जमीन चाहिए, उतनी जमीन सरकार के पास उपलब्ध नहीं है।

श्री मिश्रा ने कहा कि कारखाना खोले जाने की योजना तो बन गई थी, लेकिन कारखाना खोलने के लिए जमीन नहीं थी। इससे कुछ समय पहले 1945 में मुकेश चंद्राकर परिवार के पुरखे चंदूलाल चंद्राकर शादी का मंडप छोपड़कर दिल्ली चले गए और वहां कांग्रेस पार्टी से जुड़कर काम करने लगे। इसके बाद चंदूलाल चंद्राकर का जवाहर लाल नेहरू से पारिवारिक संबंध बन जाता है। वशिष्ठ नारायण मिश्रा ने कहा कि चंदूलाल चंद्राकर से पारिवारिक रिश्तों की ही वजह से एक दिन नेहरूजी ने चंदूलाल चंद्राकर को बुलाया तो उन्हें बताया कि आपके छत्तीसगढ़ में, जो कि पहले मध्य प्रांत और बरार स्टेट हुआ करता था, छत्तीसगढ़ उसका हिस्सा था, वहां इस्पात का कारखाना खुल रहा है। पूर्व में क्षेत्र में पानी की दिक्कत थी, लेकिन अब गंगरेल बांध की स्थापना के बाद वहां पानी भी भरपूर मात्रा में उपलब्ध हो गया है। नेहरूजी ने कहा कि आप लोगों (चंदूलाल चंद्राकर) और आपके रिश्तेदारों ने जिस तरह गंगरेल बांध के लिए जमीन दी, यदि उसी तरह कारखाने के लिए भी जमीन दे दें तो कारखाना खुल जाएगा। उस वक्त वर्तमान भिलाई में कारखाना खोलने के लिए कुल 32 हजार एकड़ जमीन की दरकार थी।

उन्होंने बताया कि आज जिस जगह पर भिलाई इस्पात संयंत्र सीना ताने खड़ा है, वहां पूर्व में करीब 60 गांव हुआ करते थे। सभी 60 गांवों की जमीन मुकेश चंद्राकर व भूपेश बघेल के पुरखों की थी। मुकेश चंद्राकर के पुरखों ने दरियादिली दिखाई और सरकार को पूरे के पूरे गांव दे दिए, जिसके बाद भिलाई इस्पात कारखाना बना। श्री मिश्रा ने बताया कि भिलाई से करीब 2000 किलोमीटर दूर बिहार के सहरसा स्थित एक छोटे से गांव में उनके पिता रेडियो सुन रहे थे। रेडियो सुनते हुए उन्होंने सुना कि भिलाई में इस्पात का कारखाना खुल रहा है और वहां नौकरियां मिल रही है। यह सुनने के बाद वे ट्रेन में बैठकर रवाना हो गए और भिलाई-3 रेलवे स्टेशन में उतरे। यहां उतरने के बाद उन्होंने वहीं लाउड स्पीकर पर आवाज सुनी। यह आवाज थी – नाम लिखाओ-नौकरी पाओ…। वशिष्ठ नारायण मिश्रा ने बताया कि यह सुनने के बाद पिताजी और उनके साथ आए कुल 13 लोगों ने अपने-अपने नाम लिखाए और उन्होंने तत्काल नौकरी मिल गई। नौकरी मिलने के बाद सभी 13 लोगों को सेक्टर-1 में एक आवास मिला, जहां रहकर सभी नौकरी करने लगे।

श्री मिश्रा ने बताया कि इसके बाद भिलाई इस्पात संयंत्र प्रबंधन ने अपने सभी कामदारों को आवास देने के लिए प्रयास शुरू किया। लेकिन यहां एक बार फिर वही समस्या थी कि जमीन उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में एक बार फिर मुकेश चंद्राकर के पुरखों ने कई गांवों की जमीन भिलाई इस्पात संयंत्र प्रबंधन को दी। आज का हुड़को और सेक्टर-9, सेक्टर-1 से 2, 3 व 4 के क्षेत्र मुकेश चंद्राकर परिवार की जमीन पर ही बसे हैं। 1956 में भिलाई में एक कारखाना बना, लेकिन मुकेश चंद्राकर या उनके परिवार ने वहां नौकरी नहीं की। पूरे देश और प्रदेश के लोग यहां नौकरी करने आए। कारखाना बना तो यहां एक पूरा का पूरा शहर बसाना पड़ा। आज का भिलाई मुकेश चंद्राकर के पुरखों की जमीन पर बसा है लेकिन आश्चर्य है कि जब वे वैशाली नगर विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाए गए तो उन्हें बाहरी से आया हुआ व्यक्ति बताया गया। जबकि हकीकत यह है कि मुकेश चंद्राकर सौ फीसद स्थानीय व्यक्ति हैं। बाहरी तो वे लोग हैं, जो भिलाई इस्पात की स्थापना के बाद यहां काम करने आए या भिलाई शहर बसने के बाद यहां रहने लगे।

भिलाई नगर निगम के वरिष्ठ पार्षद श्री मिश्रा ने कहा कि मुकेश चंद्राकर परिवार का यहां के एक-एक नागरिक पर कर्ज है। यदि हमें इस कर्ज से मुक्त होना है तो हमें मुकेश चंद्राकर का साथ देना होगा। तभी आपके वो पुरखे जो स्वर्ग में हैं, उन्हें मुक्ति मिल पाएगी। उन्होंने कहा कि पिछली बार हमने वैशाली नगर क्षेत्र से भाजपा का विधायक चुना, जबकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। उससे पहले जब हमने कांग्रेस का विधायक चुना तो प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। इस बार लोग कह रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बन रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार तभी बनेगी, जब मुकेश चंद्राकर चुनाव जीतेंगे।

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