-दीपक रंजन दास
जिनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां नहीं होतीं, वो भी जिन्दगी में सफल होते हैं. ऐसे लोगों की एक लंबी फेहरिस्त है. इसलिए जब यह खबर आई कि एक पांचवी पास युवक गांव के पहली से पांचवी तक के पांच क्लासों को पढ़ा रहा है तो आश्चर्य बिल्कुल नहीं हुआ. बल्कि उस पांचवी पास शिक्षक के नवाचार पर गर्व हुआ जो 2500 रुपए में यह जिम्मेदारी निभा रहा है. शासन द्वारा नियुक्त शिक्षक पिछले तीन साल से शहर में बैठे-बैठे मुफ्त का वेतन ले रहा है. यह दिलचस्प कहानी है नारायणपुर जिले के ओरछा ब्लाक अंतर्गत ग्राम पंचायत कोंगे के आश्रित ग्राम बीनागुंडा की. यहां एक प्राथमिक शाला है जिसमें सरकार ने एक शिक्षक जैनूराम को नियुक्त किया है. जैनूराम केवल इतना करता है कि शासन से पुस्तकें प्राप्त कर उसे स्कूल भिजवा देता है. इसके अलावा वह मध्यान्ह भोजन का सामान गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था कर देता है. इसके अलावा वह संकुल प्रभारी, ब्लाक शिक्षा अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारी को संभाल लेता है. जैनूराम सेटिंग का मास्टर है इसलिए स्कूल आने की जरूरत उसे कभी महसूस नहीं होती. परेशान गांव वालों ने बच्चों के भविष्य को देखते हुए मैनू नूरूटी को शिक्षण की जिम्मेदारी सौंप दी. नूरूटी पांचवी पास है. पालक चंदा करके उन्हें वेतन देते हैं. नूरूटी ने उन्हें निराश नहीं किया. उन्होंने पांच क्लासों को पढ़ाने का रास्ता ढूंढ निकाला. छोटी क्लासों को पढ़ाने के लिए वो बड़ी क्लास के होनहार बच्चों की मदद लेते हैं. सुविधा के लिए उन्होंने बच्चों को दो समूह में बांट दिया है. एक में पहली से तीसरी तक के बच्चे हैं तो दूसरे में चौथी और पांचवी के. जब कभी नूरूटी स्कूल नहीं आ पाते तो होनहार बच्चे ही क्लास ले लेते हैं. अब इसकी तुलना उदयपुर के एक प्रायमरी स्कूल से करते हैं. इस स्कूल में 12 बच्चे हैं जिन्हें पढ़ाने के लिए एक प्रधान पाठक और दो शिक्षक नियुक्त हैं. जर्जर होने के कारण यहां के शाला भवन को ढहा दिया गया है. बच्चे अब खुले आसमान के नीचे पढ़ते हैं. तीन-तीन सरकारी गुरुजी 12 बच्चों को बैठाने के लिए एक कमरे की व्यवस्था नहीं कर पाए हैं. एक तरफ नियमों से बंधे लाचार कर्मचारी हैं तो दूसरी तरफ एक बिंदास शिक्षक. समस्याओं का समाधान दोनों अपने-अपने ढंग से ढूढते हैं. आंख पर पट्टी और नाक में नकेल हो तो घोड़ा जल्द ही तांगे का होकर रह जाता है. यह भी एक तरह का कम्फर्ट जोन है. उसे न इधर-उधर का दिखता है और न ही वो देखना चाहता है. इस ढर्रे को तोड़े बिना नवाचार नहीं हो सकता. रही बात पढ़ाने की तो बिहार के सेलेब्रिटी मैथ्स गुरू रजनीकांत श्रीवास्तव जिस क्लास में पढ़ते थे, उसी क्लास के बच्चों को पढ़ाया करते थे. बीमारी ने आईआईटी की तैयारी छुड़ाई तो मैथ्स गुरू बन गए. आज उनके पढ़ाए 60 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में सफल होते हैं.
Gustakhi Maaf: पांचवी पास पढ़ा रहा पांच-पांच क्लास




