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Gustakhi Maaf: नर्सिंग कालेजों में भेड़-बकरियों की भर्ती

By Om Prakash Verma
Published: January 31, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
अब प्रदेश के नर्सिंग कालेज निशाने पर हैं. एक के बाद एक लगातार खुलते जा रहे नर्सिंग कालेजों के लिए बच्चे जुटाने सरकार ने नर्सिंग प्रवेश परीक्षा में शून्य पाने वालों को भी प्रवेश की पात्रता दे दी है. बावजूद इसके सीटें खाली हैं. यही हाल कभी अभियांत्रिकी महाविद्यालयों का हुआ था. कुकुरमुत्तों की तरह उग आए इंजीनियरिंग कालेजों की हालत इतनी खराब हो गई थी कि इनमें से अधिकांश को बीएससी और बीकॉम जैसे पाठ्यक्रमों की तरफ मुड़ना पड़ा. अब यही हालत नर्सिंग कालेजों की है. प्रवेश परीक्षा में शून्य पाने वाले बच्चों को भी अब बीएससी नर्सिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश दिया जा सकता है. इसके पीछे सरकार की मंशा क्या है, यह तो चिकित्सा शिक्षा निदेशालय (डीएमई) ही बता सकता है. सरकार योग्य नर्सें पैदा करना चाहती है या केवल नर्सिंग कालेज संचालकों की जेब भरना चाहती है? ये बच्चे कोई भी परीक्षा पास नहीं कर सकते और अंततः साल दो साल खराब करने के बाद कालेज छोड़कर अपने गांव लौट जाते हैं. राज्य में 2018 तक केवल 88 नर्सिंग कालेज थे. 2022 में इनकी संख्या 147 हो गई. नया नर्सिंग कालेज खोलने के लिए डीएमई अनुमति देता है, स्टेट नर्सिंग काउंसिल मान्यता देती है और आयुष विश्वविद्यालय संबद्धता जारी करता है. ये सभी अपने अपने स्तर पर कालेजों का निरीक्षण भी करते हैं. व्यापमं ने पहली बार 2012 में नर्सिंग प्रवेश परीक्षा आयोजित की थी. तब 50 प्रतिशत का कटऑफ था. जब कालेजों के लिए बच्चे कम पड़ने लगे तो 2019 में इसे घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया. दिसम्बर 2022 में इसे और घटाकर शून्य प्रतिशत कर दिया गया. भारी भरकम फीस भरने के बाद भी ये बच्चे कोई परीक्षा पास नहीं कर पा रहे. पिछले साल तक तो ले-देकर 50 प्रतिशत बच्चे पास हो रहे थे पर इस वर्ष का रिजल्ट केवल 41 प्रतिशत रहा. जो बच्चे पास हो रहे हैं, उनमें से भी आधे से ज्यादा को ढंग की नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं. बीएससी नर्सिंग की डिग्री लेने के बाद भी ये बच्चे 4-5 हजार की नौकरी करने के लिए विवश हैं. अस्पतालों में इससे ज्यादा वेतन क्लास फोर स्टाफ का होता है. इनमें से अधिकांश बच्चे ग्रामीण इलाकों से आते हैं. इन्हें ठीक से हिन्दी नहीं आती, अंग्रेजी तो बहुत दूर की बात है. आसान नियमों के चलते ये बच्चे नर्सिंग में प्रवेश तो ले लेते हैं पर एक साल के भीतर ही कालेज छोड़कर जाने को विवश होते हैं. झूठा सपना तो टूटता ही है, पैसे भी बरबाद होते हैं और समय भी नष्ट होता है. यह तो सरासर ठगी है. आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति अशोक चंद्राकर स्वयं कहते हैं कि प्रवेश परीक्षा में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक प्राप्त करना जरूरी होना चाहिए. कुलसचिव भी इससे सहमत हैं पर कुछ कहना नहीं चाहतीं. लिहाजा ये कालेज डिग्रीधारी बेडसाइड अटेंडेंट ही पैदा कर पा रहे हैं.

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