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छत्तीसगढ़ बना ‘जल आत्मनिर्भर राज्य’ का मॉडल, 42000 से अधिक किसानों को मिली सिंचाई से कृषि में आत्मनिर्भरता

By Mohan Rao
Published: November 10, 2025
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तांदूला जलाशय
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25 वर्षों में सिंचाई का रकबा 87 हजार से बढ़कर 1 लाख 13 हजार हेक्टेयर

दुर्ग। “जल ही जीवन, जल ही विकास” और “हर खेत तक पानी – हर किसान के चेहरे पर मुस्कान” के मूलमंत्र पर चलते हुए, छत्तीसगढ़ राज्य के गठन (वर्ष 2000) के बाद तांदुला जल संसाधन संभाग दुर्ग ने बीते 25 वर्षों में सिंचाई विकास, जल संरक्षण, तकनीकी नवाचार और जनकल्याण के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के दूरदर्शी नेतृत्व और राज्य सरकार की कृषक-केंद्रित नीतियों के परिणामस्वरूप, विभाग ने छत्तीसगढ़ को “जल आत्मनिर्भर राज्य” बनाने की दिशा में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। विभाग की प्राथमिकताएँ स्पष्ट हैं: जल संसाधनों के माध्यम से ‘जल से जनकल्याण’, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से ‘सिंचाई में समृद्धि’, और आधुनिक कार्यप्रणाली द्वारा ‘तकनीक से पारदर्शिता’ सुनिश्चित करना ही इसका मुख्य ध्येय है।

तांदुला जल संसाधन संभाग ने सिंचाई सुविधाओं के विस्तार में क्रांति ला दी है। राज्य निर्माण के समय जहाँ केवल 97 सिंचाई परियोजनाएँ संचालित थीं, वहीं वर्तमान में 118 परियोजनाएँ सक्रिय रूप से क्रियान्वित हैं। नहरों की लंबाई 1148 कि.मी. से बढ़कर 1349 कि.मी. हो गई है, जिससे जल आपूर्ति प्रणाली अधिक विस्तारित हुई है। अविभाजित दुर्ग ज़िले में सिंचाई का रकबा 87,930 हेक्टेयर से बढ़कर वर्तमान में 1,13,538 हेक्टेयर हो गया है। तकनीकी नवाचार ने वितरण प्रणाली में जल अपव्यय को न्यूनतम किया है। नहर लाइनिंग, सुदृढ़ संरचनाएँ और गेट स्वचालन का उपयोग किया गया है। दुर्ग-बालोद अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों को स्थायी जलापूर्ति के लिए खरखरा-शिवनाथ नदी पाइपलाइन योजना (₹1520 करोड़) और तांदुला ऑगुमेंटेशन सहगांव उद्वहन सिंचाई योजना (₹238 करोड़) जैसी विशाल परियोजनाएँ शुरू की गई हैं, जिसने 18,000 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा प्राप्तहो रही है। उद्वहन सिंचाई योजनाओं द्वारा ऊँचाई वाले क्षेत्रों में भी जलापूर्ति संभव हुई है, जिससे “अंतिम छोर तक सुगम सिंचाई – अंतिम खेत तक पानी की गारंटी” सुनिश्चित हुई है। इस वर्ष भू-जल पुनर्भरण हेतु 265 रिचार्ज पिट एवं 300 सोक पिट का निर्माण कर वर्षा जल का पुनर्भरण सुनिश्चित किया गया है।

कृषि समृद्धि और जल प्रबंधन में उपलब्धियाँ
तांदुला जल संसाधन संभाग के प्रयासों से 42,000 से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष सिंचाई सुविधा मिली है, जिसने कृषि से आत्मनिर्भरता तक की उनकी यात्रा को मजबूत किया है। सिंचाई सुविधा के कारण फसल उत्पादकता में 30-40 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है और रबी फसल का क्षेत्रफल दोगुना हो गया है। “प्रति बूंद अधिक फसल” के उद्देश्य से स्प्रिंकलर एवं ड्रिप प्रणाली को प्रोत्साहन दिया गया है। “कृषक जल उपयोग समितियों” के माध्यम से जल वितरण में सहभागिता और पारदर्शिता सुनिश्चित की गई है। इन सुविधाओं से कृषि आधारित लघु उद्योग, प्रसंस्करण एवं मत्स्य पालन को प्रोत्साहन मिला है, जिससे कृषक आय में वृद्धि हुई है और ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक स्थिरता स्थापित हुई है, साथ ही हरित क्रांति को नई दिशा मिली है। जल संरक्षण के मोर्चे पर, विभाग ने वर्षा जल संचयन हेतु तालाब, बांध, परकोलेशन टैंक और रिचार्ज संरचनाएँ निर्मित की हैं। डी-सिल्टिंग, मरम्मत एवं आधुनिकीकरण से जलाशयों की संग्रहण क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन और जल बजटिंग प्रणाली से जल उपयोग का वैज्ञानिक एवं संतुलित नियोजन किया जा रहा है। महिला एवं स्व-सहायता समूहों की भागीदारी से जल प्रबंधन को सामुदायिक स्वरूप दिया गया है। “जल शक्ति अभियान” के अंतर्गत “पानी बचाओ, जीवन बनाओ” जन-जागरूकता अभियान को जन-आंदोलन का स्वरूप दिया गया है, जो “भू-जल पुनर्भरण – भविष्य की सुरक्षा” के सिद्धांत पर सतत कार्य कर रहा है।

तकनीकी उत्कृष्टता, पारदर्शिता और सामाजिक लाभ
तांदुला जल संसाधन संभाग ने जल प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए “डिजिटल जल क्रांति” की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। डीजीपीएस, ड्रोन सर्वेक्षण, जीआईएस मानचित्रण द्वारा सटीक स्थल सर्वेक्षण किया गया है। रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम (आरटीएमएस) से नहरों एवं जलाशयों की निगरानी में दक्षता आई है और प्रस्तावित स्काडा (एससीएडीए) प्रणाली से गेट संचालन का स्वचालन संभव होगा, जिससे मानव त्रुटि में कमी आएगी। ई-ऑफिस और ऑनलाइन प्रोजेक्ट ट्रैकिंग सिस्टम से पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की गई है। इन उपलब्धियों से सामाजिक एवं पर्यावरणीय स्तर पर भी बड़ा लाभ हुआ है। सिंचाई सुविधा से ग्रामीण पलायन में कमी आई है और स्थिर आजीविका में वृद्धि हुई है। भू-जल स्तर में वृद्धि से पर्यावरणीय संतुलन मजबूत हुआ है। साथ ही तालाबों एवं जलाशयों में जैव विविधता संरक्षण और मत्स्य पालन को बढ़ावा मिला है। “हर ग्राम, हर घर – जल सुरक्षा” का अभियान अब जन-आंदोलन बन चुका है। प्रशासनिक सुधार के तहत जल नीति 2025 के अंतर्गत सतत उपयोग और जल मूल्य निर्धारण पर कार्य किया जा रहा है। राज्य स्तर जल डेटा पोर्टल से सभी आँकड़े सार्वजनिक किए गए हैं और जन शिकायत निवारण प्रणाली से जनता का विश्वास सुदृढ़ हुआ है।

भविष्य की दिशा और अटूट संकल्प
भविष्य की दिशा में, विभाग “प्रति बूंद अधिक फसल” लक्ष्य के अंतर्गत माइक्रो सिंचाई प्रणाली और नहरों का पूर्ण आधुनिकीकरण कर रहा है। सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई पंपों के विस्तार और एनीकट को बैराज में रूपांतरित करने की योजना पर कार्य चल रहा है। जल संसाधन विभाग का अटूट संकल्प है कि राज्य के प्रत्येक किसान तक जल पहुँचाया जाए और सिंचाई क्षमता में निरंतर वृद्धि की जाए। इसके साथ ही, जल का न्यायसंगत एवं सतत उपयोग सुनिश्चित करते हुए औद्योगिक, शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जलापूर्ति की एक आत्मनिर्भर प्रणाली विकसित की जाए। इन संकल्पों के साथ विभाग यह सुनिश्चित करता है कि छत्तीसगढ़ में “जल ही जीवन, जल ही विकास – यही छत्तीसगढ़ का विश्वास” हमेशा कायम रहे।

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