नई दिल्ली (एजेंसी)। देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पारी की शुरुआत भ्रष्टाचार के विरोध में उपजे जनाक्रोश का परिणाम थी, लेकिन राजनीति में उनकी जड़ें जमाने का श्रेय उनकी ‘मुफ्त’ की राजनीति को जाता है। आम आदमी ने केजरीवाल के इस वादे पर इतना भरोसा किया कि उनके सामने जमे-जमाए राजनीतिक दलों के पांव उखड़ गए। इसके दम पर केजरीवाल ने कांग्रेस से न केवल दिल्ली, बल्कि पंजाब भी छीन लिया। भाजपा भी इस राजनीति की शिकार हुई और उसे भी दिल्ली विधानसभा चुनावों में केजरीवाल के हाथों लगातार दो बार करारी हार का सामना करना पड़ा।

दिल्ली की रामलीला मैदान में हुई आम आदमी पार्टी की महारैली में ये बातें सामने आईं। आप नेताओं ने कहा कि बदले हुए दौर में अब भाजपा और कांग्रेस ने भी इस फॉर्मूले को आजमाना शुरू कर दिया है। भाजपा किसानों को आर्थिक सहायता, मुफ्त आवास योजना, राशन योजना, पांच लाख रूपये तक के मुफ्त इलाज का वादा जैसे लोकलुभावन वादे कर केंद्र में दुबारा सत्ता में आने में कामयाब हुई तो कांग्रेस ने इसी तरह के वादों पर हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में बड़ी जीत हासिल की। अरविंद केजरीवाल ने खुद यह आरोप लगाया है कि भाजपा और कांग्रेस अब उनके वादों की नकल कर रहे हैं।
बड़ा प्रश्न है कि यदि भाजपा और कांग्रेस भी मुफ्त के वादों पर खुलकर राजनीति करने लगे हैं तो अरविंद केजरीवाल की राजनीति का क्या होगा? जनता किसके वादों पर भरोसा करेगी और क्या अब भी केजरीवाल भाजपा या कांग्रेस से कोई राज्य छीनने में कामयाब हो सकेंगे?




