भोपाल (एजेंसी)। ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड ने काजियों के लिए एक खास फरमान जारी किया है। इसके तहत उनसे कहा गया है कि अगर कहीं पर हिंदू-मुस्लिम के बीच शादी हो रही है तो काजी यह सुनिश्चित करें कि युवक-युवती के परिजन वहां मौजूद रहें। बोर्ड अध्यक्ष ने सोमवार को यह घोषणा की।

चेक करें सभी जरूरी डॉक्यूमेंट्स
उलेमा बोर्ड के अध्यक्ष काजी सैय्यद अनस अली नदवी ने अपने ऐलान को सही ठहराया। उन्होंने कहाकि माता-पिता की सहमति के बिना मध्य प्रदेश में विपरीत धर्मों के बीच शादियां बढ़ी हैं। इसके चलते प्रदेश शांति और समरसता प्रभावित होने लगी है। उन्होंने कहाकि इस संबंध में सभी काजियों को पत्र लिखा गया है। इसमें उनसे कहा गया है कि अगर हिंदू और मुस्लिम धर्म के युवक-युवती शादी कर रहे हैं तो दोनों के माता-पिता की सहमति के साथ-साथ उनकी मौजूदगी भी जरूरी है। नदवी ने यह भी कहाकि शादी के रजिस्ट्रेशन के वक्त सभी जरूरी कागजात की भी जांच की जानी चाहिए। डॉक्यूमेंट्स पूरी तरह सही पाए जाने पर ही शादी की इजाजत दी जानी चाहिए।
शादियों का मकसद धर्मांतरण नहीं होना चाहिए
इसके साथ बोर्ड अध्यक्ष ने यह भी कहाकि शादियों का मकसद केवल धर्मांतरण नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहाकि हमें ऐसी शिकायतें मिली हैं कि दो धर्मों के लोग चुपचाप विवाह कर रहे हैं। इसके चलते गैरजरूरी तनाव पैदा हो रहा है। उन्होंने कहाकि केवल शादी के लिए धर्म बदलना उचित नहीं है। नदवी ने यह भी कहाकि ऐसे मामले भी सामने आए हैं कि लोगों ने केवल शादी के लिए इस्लाम के मुताबिक अपना नाम बदल लिया। शादी रजिस्टर कराने के बाद वह अपने पुराने नाम और पुरानी पहचान के साथ रह रहे हैं।
इंदौर के शहर काजी ने कही यह बात
ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड अध्यक्ष काजी सैय्यद अनस अली नदवी ने कहाकि इस फरमान को न मानने वाले काजियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। वजह, ऐसा करना न सिर्फ इस्लाम का अपमान है, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब के भी खिलाफ है। वहीं इंदौर के शहर काजी इशरत अली ने कहाकि मध्य प्रदेश के फ्रीडम ऑफ रेलिजन एक्ट के लागू होने के बाद हम विपरीत धर्मवालों के बीच शादियां रजिस्टर नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहाकि इस्लाम के मुताबिक कोई भी वयस्क युवक-युवती किन्हीं दो गवाहों की मौजूदगी में शादी कर सकते हैं। इस दौरान उनकी माता-पिता की मौजूदगी अनिवार्य नहीं है।




