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गुस्ताखी माफ: यूथ स्किल डेवलपमेंट डे

By @dmin
Published: July 15, 2022
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गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
गुस्ताखी माफ: भाजपा के गढ़े हुए मुद्दे, आयातित नेतृत्व
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-दीपक रंजन दास
भारत सरकार के कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने 9 नवम्बर, 2014 को यह निर्णय लिया कि देश में युवा कौशल विकास दिवस मनाया जाना चाहिए। इसके लिए 15 जुलाई की तिथि तय की गई। इस तिथि की घोषणा संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहले ही कर दी थी। इसका उद्देश्य था युवाओं को ऐसे कौशल से जोडऩा जो उन्हें बेहतर रोजगार उपलब्ध करा सके, उन्हें आत्मनिर्भर बना सके और उनमें उद्यमिता के बीज बो सके। जाहिर है मंत्रालय ने यह भार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा उच्च शिक्षा मंत्रालय के जरिए महाविद्यालयों को सौंप दिया। कुछ कौशल विकास केन्द्र भी खुले। वैसे पहले यह काम आईआईटी और पालीटेक्निक करते थे। अब भी कर रहे हैं। सामान्य डिग्री कालेजों के सामने दिक्कत यह थी कि युवाओं में आखिर किस तरह का कौशल विकसित किया जाए। जो कुछ सिखाया जा सकता था, जिसके भी पैसे मिल सकते थे, वह सब तो पहले से ही किया जा रहा था। लिहाजा कौशल विकास के नाम पर नौटंकी शुरू हो गई। बानगी देखिए- मिट्टी के दीये बनाना, मिट्टी का गणेश बनाना, राखी बनाना, अचार-मुरब्बा-पापड़ बनाना, अगरबत्ती-फिनायल-टॉयलेट क्लीनर बनाने का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। इन क्षेत्रों में पहले ही महिला स्व-सहायता समूहों की तगड़ी एंट्री हो चुकी है। बिना ब्रांड के इन चीजों को बेच पाना टेढ़ी खीर है। वैसे भी इन्हें बनाना सीख कर आप सिर्फ कारीगर बन सकते हैं। अति-कुशल होने के बाद भी हद से हद 300 से 500 रुपए रोजी कमा सकते हैं। बच जाते हैं प्रफेशनल कोर्स। इनमें ब्यूटीशियन, ड्रेस डिजाइनिंग, इंटीरियर डेकोरेशन जैसे कौशल आते हैं। इनका क्रैश कोर्स केवल एक छलावा है। इससे तो अच्छा है कि वह आलूगुंडा, समोसा, पोहा, मिर्ची भजिया बनाना सीखे। देश का मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर काफी बड़ा हो चुका है। दवा से लेकर कपड़ों तक, बनाने वाले इतने हो गए हैं कि सेल्स खुद एक समस्या बन गई है। इस क्षेत्र में नौकरियां भी हैं पर योग्य लोग मिलते ही नहीं। डिग्री बांटने-बेचने वाले यदि इस क्षेत्र में फोकस करें तो शायद बात बन जाए। वनोपज, कृषि उत्पाद से लेकर स्व-सहायता समूहों द्वारा तैयार किये जा रहे माल के विपणन का विशाल क्षेत्र आज भी असंगठित है। वाणिज्य एवं प्रबंधन महाविद्यालय यदि इसके लिए पाठ्यक्रम तैयार करें तो उस क्षेत्र में कौशल का विकास किया जा सकता है, जिसमें पैसा भी है और संतुष्टि भी। बड़े-बड़े रिसर्च पर फोकस करने की बजाय यदि 140 करोड़ की आबादी की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने पर ध्यान दें तो तकनीकी स्नातक भी नए और बेहतर उत्पाद लेकर आ सकते हैं। वैसे ठाठ-बाट और पैसा सबसे ज्यादा नेतागिरी और ठेकेदारी में है। पर इसकी ट्रेनिंग आज भी गुरूकुल फार्मेट में होती है। योग्य गुरू का चुनाव करें, पूर्ण समर्पण करें, गुरू को खुश रखें, एक से बढ़कर एक दिव्यास्त्र मिलेंगे, महारथी बनने का सपना साकार हो जाएगा।

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