-दीपक रंजन दास
तकनीकी शिक्षा के लिए हिन्दी मीडियम की किताबें छप रही हैं। अगर बच्चों ने इन किताबों को खरीद लिया तो वे शर्तिया फेल हो जाएंगे। यकीन न आता हो तो हाई स्कूल की पढ़ाई छत्तीसगढ़ी में करवाकर देख लो। बोलचाल की भाषा अब न हिन्दी रही है, न छत्तीसगढ़ी। अंग्रेजी तो वह हो ही नहीं सकती। नई भाषा है हिंग्लिश है जो इन सभी भाषाओं के मेल से बनी है। एक आम भारतीय हिंग्लिश में ही दक्ष होता है। उसे कोई भी भाषा शुद्ध रूप में नहीं आती। देश के तमाम शिक्षाविदों ने पिछले 30-40 सालों में विद्यार्थियों का यह हाल किया है। छत्तीसगढ़ में सभी लोग ‘हांÓ के लिए ‘हवÓ का प्रयोग करते हैं। धन्यवाद और शुक्रिया के मुकाबले थैंक-यू कहना ज्यादा आसान लगता है। गुडमार्निंग और मॉर्निंग वॉक जैसे शब्द सभी के शब्दकोश में है। तो फिर हिन्दी मीडियम में इंजीनियरिंग की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल, हम यह मानने को तैयार नहीं है कि स्कूल-कालेजों में अंग्रेजी पढ़ाने का हमारा तरीका सिरे से गलत है। वरना 12-15 साल अंग्रेजी पढऩे के बाद किसी को हिन्दी के ऐसे शब्द ढूंढकर या गढ़कर लाने की जरूरत नहीं पड़ती, जिन्हें बोलने में ही दांत टूट जाएं। हम यूं ही नहीं कह रहे, आपको सैम्पल दिखाते हैं। सभी ने स्कूल कालेज में ओरिएंटेशन प्रोग्राम के बारे में सुना होगा। इसे हिन्दी में अभिविन्यास कहते हैं। ज्वाइंट ओवरलैंपिंग को हिन्दी में अतिव्यापी कहा जाएगा। पिकनिक के लिए प्लान तो सभी बनाते होंगे, इसे हिन्दी में अनुविक्षेप कहा जा सकता है। इसी तरह हायपरबोला के लिए अतिपरवलय, शीट के लिए पत्रक, क्लॉकवाइज के लिए दक्षिणावर्त कहना होगा। डेवलपमेंट को विकास कहने वाले भी समझ लें – इसे परिवर्धन कहना होगा। शहर में तमाम इंजीनियर, डाक्टर और बड़े-बड़े अधिकारी मिल जाएंगे जिनकी शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुई थी। पर इन्होंने विज्ञान और गणित के साथ ही हिन्दी और अंग्रेजी को भी गंभीरता से लिया। हालांकि उन दिनों अंग्रेजी की शिक्षा छठवीं क्लास से शुरू होती थी पर पढ़ाने वाले और पढऩे वाले दोनों गंभीर होते थे। क्लास में रीडिंग, एक्सप्लेनेशन और डिस्कशन होते थे। न इंटरनेट था न ओटीटी और न इंग्लिश मूवीज की बाढ़। फिर भी इन बच्चों ने अंग्रेजी सीखी। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर इन लोगों का समान दखल है। दरअसल मु_ी में सिमट रही दुनिया को रिवर्स गीयर में डालने की पैरवी करने वाले खुद संकीर्ण विचारों के हैं। उन्हें आज भी ऐसा लगता है कि शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। स्थापित तथ्य यह है कि आप अपने घर के भीतर मातृभाषा में वार्तालाप करते हैं, मोहल्ले में मोहल्ले की भाषा बोलते हैं, स्कूल में औपचारिक भाषा का प्रयोग करते हैं। उच्च शिक्षा एक अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्म है जहां अंतरराष्ट्रीय भाषा की जरूरत पड़ती है। स्कूल-कालेजों की जरूरत भी इसीलिए है। जिनसे एक भाषा नहीं सीखी जा रही, वे पढ़ लिखकर भी क्या ही करेंगे।





