-दीपक रंजन दास
महाभारत का घटनाक्रम तो सभी को याद है। द्रौपदी का भरी सभा में अपमान हुआ। जुए में हार कर उसके पांच-पांच महाबली पति सिर झुकाए बैठे थे। दरबार में बैठे सभी महारथी किसी न किसी तरह की मर्यादा में बंधे हुए थे और हस्तक्षेप नहीं कर सकते थे। तब द्रौपदी को उनके भाई श्रीकृष्ण ने निर्वस्त्र होने से बचा लिया था। पर श्रीकृष्ण ने भी दुर्योधन या दु:शासन को न तो रोका था और न ही स्वयं सजा नहीं दी। कदाचित यह दायित्व पांच पांडवों का था। उस समय वे जुए में हारे हुए व्यक्ति की मर्यादा का निर्वहन कर रहे थे। हम सभी जानते हैं कि बाद में कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ और पांडवों ने गिन-गिन कर बदला लिया। किसी की बांह उखाड़ी, किसी की छाती फाड़ी, किसी की जंघा तोड़ी और द्रोपदी ने रक्त से अपने केश धो लिए। इस युद्ध की विभीषिका किसी विश्व युद्ध से कम नहीं थी। सबकुछ बर्बाद हो गया था। इसयुद्ध में 45 लाख पुरुषों ने भाग लिया था जिसमें से लगभग सभी मारे गए थे। उस समय की आबादी के हिसाब से देखें तो 16 साल से अधिक उम्र के लगभग सभी पुरुष मारे गए थे। रह गए थे केवल बच्चे और महिलाएं। पांडवों की शासन की इच्छा जाती रही थी। उन्होंने राजपाट त्याग दिया और हिमालय को प्रस्थान कर गए। पर अब महाभारत नहीं हो सकता। अब यदि ‘द्रौपदीÓ का भरे दरबार में अपमान हुआ और पतियों के रहते भाई को इज्जत बचाने के लिए आना पड़ा तो वह खड़े पैर अपने पतियों को छोड़ देगी और भाई के साथ मायके चली जाएगी। वहां जाने के बाद वह पतियों समेत ससुराल के पूरे कुनबे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा देगी। महिला संगठनों को साथ लेकर अपना मोर्चा खुद संभाल लेगी। बाद में अपने भाई से भी लड़ लेगी कि जब तुम वहां दु:शासन को मार सकते थे, दुर्योधन के दांत तोड़ सकते थे तो खिड़की से साड़ी देने की क्या जरूरत आन पड़ी थी। वह कहती कि सभी पुरुष एक जैसे होते हैं। सभी ने दरबार में हो रहा तमाशा देखा और उसका आनंद लिया। इसके बाद कौरव-पांडव सिर जोड़ कर इस समस्या से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढने लगते। वे कहते कि भाई ही भाई के काम आता है। श्रीकृष्ण कुछ दिनों तक तो मांडवाली करने की कोशिश करते फिर थक हारकर दोनों को अपने हाल पर छोड़कर अपने राजपाट को लौट जाते। न महाभारत होता, न भारतभूमि पुरुषों से रुक्त हो जाती और न ही पांडवों को हिमालय जाना पड़ता। यदुवंशियों को गांधारी श्राप नहीं देती और भारतवर्ष के टुकड़े टुकड़े नहीं हुए होते।





