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“पोट्ठ लईका पहल” से बदली तस्वीर- कुपोषण पर प्रभावी प्रहार, स्वस्थ बचपन की ओर सशक्त कदम

By Poonam Patel Published April 30, 2026
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“पोट्ठ लईका पहल” से बदली तस्वीर- कुपोषण पर प्रभावी प्रहार, स्वस्थ बचपन की ओर सशक्त कदम
“पोट्ठ लईका पहल” से बदली तस्वीर- कुपोषण पर प्रभावी प्रहार, स्वस्थ बचपन की ओर सशक्त कदम
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रायपुर। छत्तीसगढ़ में कुपोषण के विरुद्ध चल रही मुहिम अब प्रभावी परिणामों के साथ एक मजबूत जन-आंदोलन का रूप लेती दिख रही है। राजनांदगांव जिले में प्रशासन के नेतृत्व में महिला एवं बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग तथा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के समन्वित प्रयासों से संचालित “पोट्ठ लईका पहल” अभियान ने बच्चों के पोषण स्तर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज कराते हुए राज्य के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत किया है। जून 2025 से प्रारंभ इस अभिनव अभियान का उद्देश्य केवल कुपोषण की पहचान करना नहीं, बल्कि समुदाय को जागरूक कर व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से स्थायी समाधान सुनिश्चित करना है। इसी कड़ी में प्रत्येक गुरुवार को जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों में “पालक चौपाल” का नियमित आयोजन किया जा रहा है, जहां अभिभावकों को तिरंगा भोजन (संतुलित और विविध आहार), शिशु एवं मातृ पोषण, स्तनपान के महत्व, एनीमिया की रोकथाम, स्वच्छता और बच्चों की समुचित देखभाल जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सरल, व्यवहारिक और स्थानीय भाषा में जानकारी दी जा रही है। इसके साथ ही कुपोषित बच्चों की नियमित जांच, वजन-लंबाई की मॉनिटरिंग, आवश्यक दवाइयों की उपलब्धता और पोषण परामर्श भी सुनिश्चित किया जा रहा है, जिससे अभियान का प्रभाव सीधे जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहा है।

अभियान की शुरुआत के समय जून 2025 में जिले के 0 से 5 वर्ष के कुल 55,797 बच्चों को चिन्हित किया गया था, जिनमें से 9,751 बच्चे कुपोषण की विभिन्न श्रेणियों—गंभीर, अति गंभीर और मध्यम—में शामिल थे। यह स्थिति प्रशासन और विभागों के लिए एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन सुनियोजित रणनीति, विभागीय समन्वय और सामुदायिक सहभागिता के चलते इस चुनौती को अवसर में बदला गया। लगातार फील्ड विजिट, घर-घर संपर्क, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मितानिनों और स्वयं सहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी तथा अभिभावकों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ने अभियान को मजबूती प्रदान की। परिणामस्वरूप मार्च 2026 तक जिले में कुपोषित बच्चों की संख्या घटकर 5,146 रह गई है। गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या 731 से घटकर 328 तथा अति गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या 443 से घटकर 128 हो जाना इस बात का प्रमाण है कि समय पर हस्तक्षेप और सतत निगरानी से गंभीर स्थितियों में भी सुधार संभव है। मध्यम कुपोषण के मामलों में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है, जो समग्र पोषण सुधार की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।

यदि प्रतिशत के आधार पर देखा जाए तो जून 2025 में जिले में कुपोषण की दर 11.23 प्रतिशत थी, जो मार्च 2026 तक घटकर 7.55 प्रतिशत पर आ गई है। यानी महज कुछ महीनों में 3.68 प्रतिशत की ठोस कमी दर्ज की गई है, जो किसी भी पोषण अभियान के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। इस सफलता के पीछे केवल योजनाओं का क्रियान्वयन ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्यरत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मितानिनों, स्वास्थ्य अमले और स्वयं सहायता समूहों की प्रतिबद्धता, नियमित फॉलोअप और जन-जागरूकता का बड़ा योगदान है। उन्होंने न केवल बच्चों की निगरानी की, बल्कि परिवारों के खान-पान और जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाने का भी कार्य किया।

“पोट्ठ लईका पहल” आज केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामुदायिक सहभागिता से संचालित एक सशक्त जन-आंदोलन बन चुका है, जिसमें समाज का हर वर्ग बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यह पहल स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि यदि योजनाओं का क्रियान्वयन संवेदनशीलता, सतत प्रयास और जनभागीदारी के साथ किया जाए, तो कुपोषण जैसी जटिल समस्या पर भी प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार के मार्गदर्शन में इस प्रकार की पहलें राज्य को कुपोषण मुक्त बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा रही हैं और “पोट्ठ लईका पहल” अन्य जिलों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में स्थापित हो रही है, जो आने वाले समय में प्रदेश के बच्चों के स्वस्थ, सशक्त और सुरक्षित भविष्य की मजबूत नींव तैयार करेगी।

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