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National

कोरोना: भारत में 1 फीसदी संक्रमित मरीज वेंटिलेटर पर नहीं

By @dmin
Published: April 11, 2020
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नई दिल्ली। भले ही कोरोना के मरीजों की बढ़ती तादाद इटली, स्पेन, अमेरिका जैसे देशों में वेंटिलेटर की जरूरतों को लेकर हाहाकार मचा हुआ है, लेकिन भारत में स्थिति नियंत्रण में है। भारत देश में कोरोना के 1 फीसदी मरीज भी वेंटिलेटर पर नहीं हैं। भारत में कोरोना पीड़ितों की तादाद 4000 का आंकड़ा पार है, लेकिन 17 राज्यों के सिर्फ 2 फीसदी से थोड़े ज्यादा 73 मरीज गंभीर स्थिति के कारण आईसीयू में हैं और करीब 32 मरीज वेंटिलेटर पर हैं। अमेरिका, स्पेन और इटली में आईसीयू में भर्ती मरीजों की संख्या 9 से 12 फीसदी है और 3 से 7 फीसदी तक वेंटिलेटर पर मौत से लड़ रहे हैं। आईसीएमआर की हालिया रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में जो 60 मौतें कोरोना से हुई थी, उसमें से महज आठ वेंटिलेटर पर थे।
एम्स, दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर रणदीप गुलेरिया का कहना है कि कोरोना के लगभग 80 फीसदी मरीज जल्द ठीक हो जाते हैं या उन्हें गंभीर समस्या नहीं होती। वहीं 20 फीसदी मरीजों को ज्यादा लक्षण दिखते हैं। इनमें से 3 से 5 फीसदी को ही आईसीयू की जरूरत होती है। वहीं 2 से 3 फीसदी मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ती है। दिल्ली में 445 कोरोना के मरीज अलग-अलग अस्पताल में भर्ती हैं। इनमें से 11 आईसीयू में हैं और 5 वेंटिलेटर पर हैं।
एम्स के पूर्व निदेशक एमसी मिश्रा का कहना है कि भारत में कोरोना के गंभीर मरीजों की संख्या कम होने को लेकर कई अवधारणाएं हैं, लेकिन इन पर मुहर लगना बाकी है। कोरोना का जो वायरस है, वह आरएनए वायरस है। भारत में डेंगू का बेहद प्रसार रहा है। जीका, मलेरिया से काफी लोग कभी न कभी चपेट में आए हैं और इनकी दवाओं के कारण हमारे अंदर ऐसे एंटीबॉडी हैं, जो इस वायरस का बेहतर मुकाबला कर पाने में सक्षम हैं। बीसीजी टीकाकरण के कारण भी भारतीयों की प्रतिरोधक क्षमता दूसरे देशों की तुलना में अच्छी है। भारत में बुजुर्गों की संख्या स्पेन, इटली या अमेरिका जैसे देशों के मुकाबले कम हैं, इस कारण भी भारत में गंभीर स्थिति वाले मरीजों की संख्या कम है। बुजुर्गों में डायबिटीज, हृदय, किडनी-लीवर की गंभीर समस्याएं ज्यादा होती हैं, लिहाजा उन देशों में ज्यादा मरीज आईसीयू या वेंटिलेटर में हैं। यह भी कहा जा रहा है कि भारतीयों में शाकाहार के ज्यादा प्रचलन और हल्दी जैसे कई औषधीय मसालों के कारण संक्रमणरोधी क्षमता ज्यादा है। जबकि विदेशियों की मांसाहार पर निर्भरता और ज्यादा सुरक्षित वातावरण के कारण किसी भी परजीवी से ग्रसित होने की संभावना ज्यादा रहती है। हमारे यहां वायरस कुछ म्यूटेशन देखा गया है, यानी कभी वह ज्यादा आक्रामक और कभी कम सक्रिय रहता है और भारत में यह वायरस कम सक्रियता दिखा रहा है।
लेडी हार्डिंग कॉलेज एवं हॉस्पिटल के निदेशक एनएन माथुर का कहना है कि इटली और स्पेन के मुकाबले भारत में आईसीयू में भर्ती या वेंटिलेटर पर रखे गए मरीजों की संख्या नगण्य है। भारत में महामारी अभी सामुदायिक संक्रमण स्तर पर नहीं है और देश में तमाम तरह के वायरस का लंबा इतिहास होने के कारण संभवतः हमारा शरीर इससे लड़ने में ज्यादा मजबूत है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों के लिए निजी सुरक्षा उपकरण अभी की तादाद के हिसाब से तो पर्याप्त हैं, लेकिन आंकड़ों में तेजी से इजाफा होगा तो संकट पैदा हो सकता है।

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