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श्रीराम कथा में प्रेरक प्रसंग, चिन्मयानंद बापू ने कहा- भगवान जिससे ज्यादा प्रेम करते हैं उसके ही नयन भिगोते हैं

By Mohan Rao
Published: December 19, 2022
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खुर्सीपार में श्रीराम कथा
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भिलाई। जीवन जीने की कला केवल मानस को समझकर ही संभव है। मानस से हमें सीख मिलती है कि हमें किन-किन बातों से सावधान रहना है और किन विचारधारा को आत्मसात करना है। रामायण से मन आत्मिक, बौद्धिक और चारित्रिक विकसा होता है। जिस तरह राजनीतिज्ञ को शहर के विकास के बारे में सोचना चाहिए उसी तरह अपने शहरवासियों के मन के विकास का भी प्रयास करना चाहिए। रामकथा ही एक ऐसा माध्यम से जिससे पूरा विकास संभव है।

खुर्सीपार के दशहरा मैदान में चल रही श्रीरामकथा के छठवें दिन राष्ट्रसंत बापू चिन्मायनंद ने कहा कि जीवन आनंद फाउंडेशन के संचालक एवं पार्षद विनोद सिंह एवं श्रीरामजन्मोत्सव समिति के जिलाध्यक्ष मनीष पांडेय ने ऐसा ही प्रयास किया है जिससे लोगों को मानसिक सुख मिल सकें। क्योंक जीवन का असली सुख हरि चरणों में ही है। उन्होंने सोमवार को सीता की विदाई के प्रसंग के साथ ही अयोध्या कांड की कथा सुनाई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि पूर्व मंत्री रमशीला साहू, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडेय, श्रीरामजन्म उत्सव के जिलाध्यक्ष युवा प्रभाग मनीष पांडेय, जीवन आनंद के फाउंडेशन के अध्यक्ष विनोद सिंह, तेज बहादूर सिहं, पियुष मिश्रा, बुधन ठाकुर, जोगिंदर शर्मा, बंटी पांडेय, रमेश माने, अजय पाठक, राजेश त्रिपाठी, उमेश मिश्रा, अजीत सिंह, प्रकाश यादव, टोपा, श्रीनु, नील मानिकपुरी, शंकर केडिया, पवन भारद्वाज, सोनू शर्मा, आदि मौजूद थे।

आंसू प्रेम की पहली शर्त
बापू चिन्मायनंद ने कहा कि माता सीता की विदाई में पूरा जनकपुर रो पडा और चारों ओर उदासीनता छा गई क्योंकि श्रीराम ने सबके मन को प्रेम से भर दिया और प्रेम की पहली शर्त ही आंसू है। उन्होंने कहा कि भगवान उन्हें ही अश्रु देते हैं जिनसे वे प्रेम करते हैं। उन्होने भरत का भी उदाहरण दिया कि राम को भरत प्राणों से प्यारे थे और भरत जी की आंखों में हमेशा आंसू रहे। उन्होंने बृजवासियों के बारे में कहा कि गोविंद को बृजवासी प्रिय थे इसलिए वे उन्हें छोडकर गए और उन्हें जाते वक्त आंसू दे गए। वे उनके पास दोबारा लौटकर नहीं आए। मीरा ने भी गोविंद से प्रेम किया और भयंकर दुख पाया। इसलिए अगर आपके जीवन में आंसू है तो यह समझना कि भगवान आपको अपने करीब रखना चाहते हैं।

बेटी तो कुल का गौरव
बापू ने सीता की विदाई का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि बेटियां तो कुल का गौरव होती है। जीवन में नारी ही सबसे ज्यादा त्याग करती है। विवाह के बाद उसे अपने बचपन के रिश्ते-नाते, घर-परिवार सबकुछ छोड़कर नए कुल में आना होता है, जबकि पुरुष अपने ही घर में रहता है। उसे कुछ भी नहीं छोड़ना पड़ता। इसलिए हमेशा नारी का सम्मान करना चाहिए। नारी के कंधों पर दो कुल की जिम्मेदारी होती है। यदि नारी कोई गलत कदम उठाती है तो उसके पिता और पति यानी दोनों परिवार की बदनामी होती है। इसिलए नारी को महान माना गया है।

जीवन में बनाए बैलेंस
बापू ने कहा कि हमें अपने जीवन में बैलेस बनाए रखना चाहिए। अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती। चाहे वह ज्यादा खाना हो या ज्यादा भूखे रहना। उन्होंने कहा कि जीवन को सरल बनाए और तालमेल बनाकर चलें। क्योंक वीणा के तार को भी ज्यादा कसेंगे या ज्यादा ढीला छोड़ेंगे तो उससे सुर अच्छे नहीं निकलेंगे।

अच्छे विचार को तुरंत अमल करें
जब अयोध्या में श्री राम को राजा बनाने का विचार राजा दशरथ को आया था तब उन्हें तुरंत अमल करना था, क्योंकि अच्छे काम को करने का मुहूर्त नहीं देखना चाहिए। बापू ने कहा कि मन में अच्छे विचार आए तो उसे तुरंत अमल करना चाहिए। चाहे वह पूजन हो , तीर्थाटन हो या फिर कोई शुभ कार्य, लेकिन बूरे और गलत काम को हमेशा टालना चाहिए। उन्होंने अयोध्या कांड के प्रसंग में मंथरा के चरित्र की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि रावण के वध के लिए राम का वन में जाना जरूरी था, और श्रीराम को वन में भेजने का कारण वही बनी। मंथरा बुद्धिवान थी, लेकिन उसने अपनी बुद्धि का दुरुपयोग किया। आपके पास जो चीज है उसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

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