-दीपक रंजन दास
आज झीरम घाटी नक्सली हमले की 10वीं बरसी है. 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था. इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, बस्तर टाइगर महेन्द्र कर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, योगेंद्र शर्मा, राजनांदगांव के युवा नेता उदय मुदलियार, प्रफुल्ल शुक्ला जैसे नेताओं की जघन्य हत्या कर दी गई थी. इसकी जांच एनआईए कर रही थी, एसआईटी का भी गठन किया गया था. पर 10 साल बीतने के बाद भी इसका कोई नतीजा नहीं निकला है. आज भी जितने मुंह उतनी बातें होती रहती हैं. कोई कहता है कि एक नेता हेलीकाप्टर में बैठकर निकल गया, दूसरा कहता है एक नेता बाइक पर सवार होकर भाग गया. एक जानकारी यह भी सामने आई थी कि इस हमले की अग्रिम पंक्ति में वे महिला नक्सली थीं जिनके गांव, घर और परिवार सलवा-जुडूम में तबाह हो गए थे. दरअसल, असाधारण मामलों में सच के कई पहलू होते हैं. इनमें से कौन सी बात किसके खिलाफ जाएगी, इसे तय करते-करते ही वक्त निकल जाता है. देश में ऐसे अनेक मामले हैं जिनका खुलासा आज तक नहीं हो पाया. इनमें से प्रमुख नाम है नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का. इस मामले में कभी सोवियत संघ की जेलों का जिक्र आता है तो कभी जापान के रैंकोजी मंदिर का तो कभी गुमनामी बाबा की खबरें सामने आती हैं. मानने वाले अपने-अपने हिसाब से अपनी कहानी खुद लिख लेते हैं. एक ऐसी ही मौत थी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की. एक ऐसी ही मृत्यु का मामला है दीनदयाल उपाध्याय का. 43 दिन पहले ही जनसंघ के अध्यक्ष चुने गए दीनदयाल का शव मुगलसराय स्टेशन पर पड़ा मिला. देश में केवल तीन ही ऐसी गंभीर वारदातें हुई हैं जिसमें अपराधी सीना ठोंककर सामने आए थे और घटना की जिम्मेदारी ली थी. इनमें से पहला है महात्मा गांधी की नाथूराम गोडसे द्वारा की गई हत्या. दूसरी घटना थी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की और तीसरी हत्या थी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की. इन तीनों घटनाओं के कारणों को भी साफ-साफ रेखांकित किया गया था. जांच पूरी हुई, मामले भी चले और सजा भी सुनाई गई. शेष सभी मामले राजनीति के काम आ रहे हैं. दरअसल, बस्तर में भाजपा की बुरी स्थिति है. भाजपा के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की पिछले कुछ महीनों में हत्या हो चुकी है. पूर्व मुख्यमंत्री ने इन घटनाओं को राजनीतिक साजिश कह दिया. इसपर “मुख्यमंत्री” ने कहा कि भाजपा चाहे तो केन्द्रीय एजेंसियों से इन घटनाओं की जांच करवा ले. वैसे, इन हत्याओं में एक बात कॉमन है. राजीव की हत्या श्रीलंका में सेना भेजने के लिए की गई. इंदिरा की हत्या गुरुद्वारे में सेना भेजने के लिए की गई. बस्तर टाइगर की हत्या सलवा-जुडूम को लेकर हुई. भाजपा नेताओं की हालिया हत्या मुखबिरी के संदेह में हुई. इनपर राजनीति करना, मूल पर पर्दा डालने जैसा है.





