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Gustakhi Maaf: क्या वाकई फिजूलखर्ची है वैवाहिक तामझाम

By Om Prakash Verma Published February 28, 2025
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
भारत का प्राण उसके उत्सवों में बसता है. भारत को त्यौहारों का देश भी कहा जाता है. इनमें से कई तो ऐसे हैं जिन्हें भारत के साथ-साथ अनेक अन्य देशों में भी धूमधाम के साथ मनाया जाता है. विवाह भी एक ऐसा ही उत्सव है. पर समय के साथ, जैसे-जैसे खुशहाली आती गई, इसका स्वरूप विकृत होता चला गया. इसका असर यह हुआ कि जिस बेटी के पांव पूजकर नवरात्रि मनाई जाती थी, उसी का नाम बोझ हो गया. बेटी के जन्म पर लोगों का मुंह लटकने लगा. किसी के यहां बेटी होने पर लोग उसे यह कहकर सांत्वना देते प्रतीत होते हैं कि बेटी नहीं, लक्ष्मी आई है घर में. बेटी के विवाह पर होने वाला भारीभरकम खर्च हजार मुसीबतों की जड़ है. ऐसे परिवार एक ढूंढो दस मिल जाएंगे जिसमें बेटी के जन्म के साथ ही उसके विवाह के लिए पैसे और सामान जोड़ने की शुरूआत कर दी जाती है. जहां परिवार किसी तरह जीवन की गाड़ी खींच रहा होता है, वहां पैसे-गहने तो नहीं जुड़ते, पर चिंता की लकीरें माथे पर कई तरह के निशान उकेर देते हैं. कुछ दशक पहले बैंकों ने भी इस मौके पर अपनी रोटी सेंकनी शुरू कर दी. वह बेटियों का विवाह धूमधाम से करवाने के लिए कर्ज देने लगे. कहां तो शादियों में औकात से अधिक खर्च करने की परिपाटी पर रोक लगाई जाती, इसे और बढ़ावा देने का साजो सामान तैयार होने लगा. टीवी, मीडिया और सोशल मीडिया ने मिलकर एक ऐसी आभासी दुनिया की रचना कर दी है जिसमें विवाह सपनों की दुनिया की तरह नजर आता है. पहले जहां यह कहा जाता था कि लड़के वालों की जिद के कारण धूमधाम से शादी करनी पड़ रही है वहीं अब यह देखा जा रहा है कि बेटियां खुद मां-बाप से तड़क-भड़क वाली शादी की मांग करती हैं. ऐसे में सामूहिक विवाह संस्कार कम से कम उन परिवारों के लिए एक सुखद अवसर है जो वहां जाकर इस पवित्र संस्कार को बहुत कम खर्च में पूरा करना चाहते हैं. मध्यप्रदेश के बागेश्वर में एक ऐसे ही सामूहिक विवाह का आयोजन किया गया. वहां राष्ट्रपति, राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने स्वयं उपस्थित होकर वर-वधु को आशीर्वाद दिया. सरकार की तरफ से यहां विवाह करने वाली सभी कन्याओं को 51-51 हजार रुपए की राशि की पेशकश भी की गई है. निजी स्तर पर करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी यह सौभाग्य शायद ही किसी सामान्य परिवार को मिल पाता. दिक्कत यह है कि वैवाहिक फिजूलखर्ची से सभी वाकिफ हैं पर इसका विरोध करने का साहस किसी में नहीं है. लोगों को लगता है कि एक दिन सूट पहनकर आलीशान कार में बैठ जाने से आगे का जीवन भी राजसी हो जाएगा. बेटियों को भी लगता है कि 30, 40 या 50 हजार का लहंगा पहनकर वे हिरोईन बन जाएंगी. अकेली युवा पीढ़ी ही है जो इस स्थिति को बदल सकती है.

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Om Prakash Verma February 28, 2025
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