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Gustakhi Maaf: हनुमान मंदिर परिसर में तोड़ू दस्ता

By Om Prakash Verma
Published: April 2, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
बीएसपी का तोड़ू दस्ता एक बार फिर सुर्खियों में है. इस बार मामला सेक्टर-9 अस्पताल स्थित हनुमान मंदिर का है। हनुमान जयंती पर इस मंदिर में लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। यह सिलसिला पिछले कई दशकों से बना हुआ है। साल दर साल भक्तों का रेला पिछले साल से बड़ा होता जाता है। हनुमान जयंती के दौरान गर्मी काफी तेज होती है। भक्तों पर अल्ट्रावायलेट किरणों की बौछार होती है। उन्हें तपिश से बचाने के लिए कई उपाय किये जाते हैं। गेट से लेकर मंदिर तक कारपेट बिछाया जाता है। पंडाल लगाया जाता है। शीतल पेय की व्यवस्था की जाती है। हनुमान जयंती पर भक्त यहां भंडारे का भी आयोजन करते हैं। भंडारा जनसहयोग से होता है। इस भंडारे के बारे में कहा जाता है कि भक्तों की संख्या चाहे जो हो, कभी कुछ भी कम नहीं पड़ता। भंडारा देर शाम, यहां तक कि रात तक चलता रहता है। भक्तों की सुविधा के लिए ही यहां डोमशेड का निर्माण किया जा रहा था। बीएसपी के नगर प्रशासन विभाग को यह रास नहीं आया। वह सीधे जेसीबी लेकर डोमशेड उखाडऩे पहुंच गया। हनुमान मंदिर परिसर में जेसीबी या बुलडोजर लेकर पहुंचने की यह घटना छह दशक पहले का इतिहास दोहराने जैसी है। यह दान की जमीन है। इस जमीन पर दानदाता के पुरखों का हनुमान मंदिर था। अस्पताल का नक्शा बना तो मंदिर को हटाने की जरूरत महसूस हुई। दानदाता और प्रबंधन में सहमति भी बन गई और मंदिर को अस्पताल परिसर से बाहर शिफ्ट करने की तैयारी शुरू हो गई। इंजीनियरों का दस्ता बुलडोजर लेकर यहां पहुंचा। पर मशीनें मंदिर तक नहीं पहुंच पाई। इसे दैव निर्देश मानकर इंजीनियरों ने मंदिर को जहां का तहां सुरक्षित छोड़ दिया और अस्पताल के नक्शे में परिवर्तन कर लिया। इस मंदिर में अस्पताल के चिकिस्तकों से लेकर यहां आने वाले मरीजों तक की गहरी आस्था रही है। इस अस्पताल की गिनती मध्यभारत के श्रेष्ठ अस्पतालों में होती रही। लगता है बीएसपी का तोड़ू दस्ता इतिहास भूल गया है। वह डोमशेड तोडऩे की जिद पर अड़ा है। उसने यहां भक्तों और पुरोहितों के साथ अभद्रता की, उनके साथ मारपीट की। वह भूल गया कि हर बात जोर-जबरदस्ती से नहीं मनवाई जा सकती। इससे पहले वह सेक्टर-4 के एक मकान को खाली करवाने के लिए जोर-जबरदस्ती पर उतर आया था। इस मामले में उसे मुंह की खानी पड़ी थी। इस मकान में बिना बिजली पानी के कैद हो गये एक ही परिवार के चार लोगों ने आत्महत्या कर ली थी जिसका कलंक आज तक इस्पात नगरी ढो रही है। वैसे भी प्रबंधन मंदिर को लेकर सहज नहीं है। आखिर, क्या हर्ज था बातचीत करने में? क्यों जरूरी था यहां जोर-जबरदस्ती करना? महिलाओं के बाल खींचना, उन्हें मुक्के मारना। तोड़ू दस्ते को भक्तों और पुजारियों से मारपीट करने की इजाजत किसने दी? कहीं यह राजनीतिक पैंतरेबाजी तो नहीं?

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