-दीपक रंजन दास
शिक्षा का प्रसार और शिक्षा की गुणवत्ता दो अलग-अलग मुद्दे हैं। सरकार शिक्षा सुविधा का विस्तार कर सकती है पर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए वह सिवाय निर्देश देने के ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। यह जिम्मेदारी समाज की है कि वह शिक्षा को लेकर संवेदनशील हो। शिक्षा सत्र का आरंभ विद्यार्थियों को तिलक लगाकर उनका सम्मान करने के साथ शुरू तो होती है पर इसके बाद कभी शिक्षक गायब तो कभी विद्यार्थी। छत्तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए अनेक उपाय किये गये हैं। पिछले चार-साढ़े चार साल में तो ऐसा महसूस हुआ कि छत्तीसगढ़ का गठन अभी-अभी हुआ है। जुलाई 2020 में पहला आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय प्रारंभ हुआ। अब इनकी संख्या 727 हो गई है। इनमें अंग्रेजी माध्यम के 377 और हिन्दी माध्यम के 350 स्कूल शामिल हैं। नए शिक्षा सत्र से एक और अभिनव प्रयोग प्रारंभ हुआ है। शिक्षाविद काफी समय से कहते आ रहे हैं कि प्राथमिक शिक्षा स्थानीय बोली अथवा भाषा में होनी चाहिए। छत्तीसगढ़ ने इस दिशा में भी पहल की है। 20 भाषा-बोलियों में द्वि-भाषीय पुस्तकें तैयार की गई हैं, ताकि बच्चे मातृभाषा में पढ़ाई शुरू कर सकें। इसकी शुरुआत बालवाडिय़ों से होगी। पिछले वर्ष राज्य में 5173 बालवाडिय़ां शुरू की गई थी। इस साल 4318 बालवाडिय़ां और खोली जा रही हैं जिससे इनकी संख्या बढ़कर 9491 हो जाएगी। स्कूल खुलते ही बच्चों को मुफ्त पुस्तकें, गणवेश आदि मिल जाएंगे। 9वीं में दाखिला लेने वाली छात्राओं को साइकिलें मिल जाएंगी। ‘मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजनाÓ के तहत 29 हजार 284 स्कूल भवनों की मरम्मत के लिए लगभग 2 हजार करोड़ रूपए की राशि स्वीकृत की गई है। यह तो हुआ सुविधाओं का विस्तार। पर स्कूलों में पूर्ण अनुशासन के साथ पढऩा-पढ़ाना भी हो, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? मध्यान्ह भोजन योजना के क्रियान्वयन से महिला स्व-सहायता समूहों को जोडऩे के सुखद परिणाम आए थे। इससे बच्चों के साथ ही शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने में मदद मिली थी। भोजन की गुणवत्ता के साथ ही उपस्थिति में सुधार हुआ था। पर उनकी अपनी सीमाएं थीं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अब सभी जनप्रतिनिधियों से आग्रह किया है कि वे नजदीक के विद्यालयो में जाकर बच्चों का मनोबल बढ़ाएं और शिक्षकों के साथ शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता को सुधारने में लगातार सहयोग भी करें। स्थानीय अधिकारियों, जिनमें आईएएस और आईपीएस भी शामिल थे, ने स्कूलों में जाना प्रारंभ किया था जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए थे। समाज में बड़ी संख्या में ऐसे अवकाश प्राप्त ज्येष्ठ नागरिक भी हैं जिनकी मदद ली जा सकती है। एक ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जिसमें स्कूल की परिधि में रहने वाले ऐसे पूर्व शिक्षकों, वरिष्ठ नागरिकों की पहचान कर उन्हें स्कूल में आमंत्रित करने का रास्ता निकाला जा सके। इनमें से जो भी स्वेच्छा से स्कूल में अपने विषय की क्लास लेना चाहें, प्राचार्य उन्हें बेखटके इसकी अनुमति दे सकें। यह भी राष्ट्र की सेवा होगी।
Gustakhi Maaf: सरकार कर रही, समाज की भी जिम्मेदारी




