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Gustakhi Maaf: सरकारी स्कूलों के निर्माण की गुणवत्ता

By Om Prakash Verma
Published: March 18, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ में अकेले बिलासपुर जिले के 274 सरकारी स्कूल बेहद जर्जर अवस्था में हैं। यह स्थिति जिले के चारों ब्लाक की है। ऐसे स्कूलों की सूची बनाकर 2022 में डीईओ कार्यालय में जमा किया था पर विभाग ने इस पर ध्यान नहीं दिया। शायद वह किसी हादसे के इंतजार में था। शासन की फटकार के बाद एक बार फिर नए सिरे से सूची बनाई जा रही है। उम्मीद है कि इसमें कुछ और स्कूलों के नाम शामिल हो जाएंगे। हालात ऐसे हैं कि एक तरफ जहां कुछ शाला भवनों को ताला लगाया जा चुका है वहीं कुछ में बच्चे जान हथेली पर लेकर पढ़ रहे हैं। उनपर छत से पलस्तर गिरता रहता है। कुछ बच्चे कक्षा के दौरान छत पर ही अपना ध्यान लगाए रहते हैं। शिक्षक भी छत पर नजर रखते हैं। जहां कहीं भी पलस्तर ढीला दिखता है, उसे डंडे से ठोंककर गिरा दिया जाता है ताकि वह बच्चों पर न गिरे। इन शाला भवनों की उम्र 25 साल या उससे कुछ अधिक है। सिंगल स्टोरी शाला भवनों की यह हालत केवल इसलिए हुई है कि इनकी छतों की ढलाई ढीली ढाली हुई। उसपर न तो मलाई का काम हुआ और न ही टारफेल्ट बिछाए गए। भिलाई टाउनशिप के सिंगल स्टोरी मकान आज भी खड़े हैं जबकि इन्हें बने 60 साल से अधिक हो चुके हैं। भिलाई टाउनशिप में केवल उन्हीं भवनों की हालत जर्जर हुई जो बहुमंजिला थे। बीएसपी मकानों की दीवारों में से होकर पेयजल और सीवेज के पाइप दौड़ते हैं। इससे बहुमंजिली इमारतों की दीवारें नमी पकड़ती हैं और सीलन से खराब हो जाती हैं। जब भवन खराब होता है तो न केवल उसका उपयोग कर रहे लोगों की जान को जोखिम होता है बल्कि वहां रखे असबाब की भी हानि होती है। खस्ताहाल स्कूलों की आलमारियां भी गल चुकी होती हैं। इनमें रखे दस्तावेज भी नष्ट होने की कगार पर हैं। पिछले साल एक ऐसे ही स्कूल में जब पुराने एडमिशन रजिस्टर को तलब किया गया तो पता चला कि उसके सारे पन्ने नमी के कारण चिपक गए हैं। स्कूलों की यह स्थिति तब है जब वह आबादी क्षेत्रों में हैं। जिनके बच्चे इन स्कूलों में पढ़ते हैं, वो सभी आसपास ही रहते हैं। पर सरकारी निर्माण की गुणवत्ता को लेकर उन्होंने कभी कोई जागरूकता नहीं दिखाई। दरअसल, हमने एक तरह से यह मान लिया है कि कोई भी भवन 25-30 साल में पुराना और जर्जर हो जाता है और उसे गिराकर नया बनाने की जरूरत पड़ ही जाती है। ठेकेदार, अधिकारी और नेता मिलकर सरकारी निर्माण का सीमेंट और लोहा पचा जाते हैं। सरकारी पैसा ठेकेदारों के माध्यम से अफसरों और नेताओं की जेब में जाता है। सरकारी नियमों पर सरकार को कम और स्थानीय आबादी को ज्यादा नजर रखनी चाहिए। छोटी-मोटी मरम्मत समय पर हो, इसके लिए दबाव बनाना चाहिए। आखिर यह जनता का पैसा है, जनता की इमारत है, राष्ट्रीय संपत्ति है।

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