-दीपक रंजन दास
प्रदेश में उच्च शिक्षा के नाम पर कुछ भी हो रहा है। दरअसल, सरकार का उद्देश्य उच्च शिक्षा की गुणवत्ता की बजाय शिक्षा का धंधा हो गया है। सरकार को उच्च शिक्षा के आंकड़े चाहिए। इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में शून्य प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी को भी अब इंजीनियरिंग में दाखिला मिल जाएगा। वजह एक ही है, इंजीनियरिंग की खाली सीटें। सरकार इन सीटों को भरना चाहती है। इनमें से कई कालेज नेताओं के हैं। तो फिर प्रवेश परीक्षा की नौटंकी क्यों? प्रवेश परीक्षा से सरकार को मोटा राजस्व मिलता है। यह एक औपचारिकता भी है। वैसे सवाल प्रवेश परीक्षा की गुणवत्ता का भी है। सरकार को लगता है कि इस परीक्षा में पास या फेल होने का कोई मतलब नहीं है। जो लोग इसे पास करके प्रवेश लेते हैं, वो भी कहां कालेज से पास होकर निकल पाते हैं। क्या यह अच्छा नहीं होता कि 12वीं के प्राप्तांकों के आधार पर ही प्रवेश दे दिया जाता? यह एक यक्ष प्रश्न है जिसका कोई जवाब सरकार के पास नहीं है। वैसे भी, सरकार इसका जवाब दे ही क्यों? कोई सवाल पूछने वाला भी तो होना चाहिए। ऐसे में 80 के दशक का एक चलन याद आता है। शिक्षाधानी भिलाई में इंग्लिश मीडियम स्कूलों में सीबीएसई पाठ्यक्रम लागू था। मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल में 11वीं की बोर्ड परीक्षा होती थी जबकि सीबीएसई में 10वीं और 12वीं बोर्ड का चलन था। सीबीएसई के 11वीं पास बिना 12वीं बोर्ड के ही इंजीनियरिंग और मेडिकल में जाते थे। डिग्री कालेज में भी उनका प्रवेश सेकण्ड ईयर में होता था। स्कूल स्तर पर 10वीं के अंकों के आधार पर ही विद्यार्थियों को विषय आवंटित कर दिये जाते थे। ऊपर से नीचे विषयों का यह क्रम बायो-मैथ्स, पीसीएम, पीसीबी हुआ करता था। च्वाइस, इंट्रेंस जैसी कोई नौटंकी नहीं थी। पर गुणवत्ता अच्छी थी। अब यह बात नहीं रही। शून्य प्राप्तांक वालों को इंजीनियरिंग में दाखिला देने के साथ ही सरकार ने अब प्रदेश में उग आए अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की सीटों को भरने का ठेका भी ले लिया है। तकनीकी कोर्स जैसे पॉलीटेक्निक, एमसीए, फार्मेसी, एमबीए तथा दूसरे प्रोफेशनल कोर्स की खाली सीटों पर भी अब दूसरे राज्यों के विद्यार्थियों के दाखिले का रास्ता खोल दिया गया है। वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं है। यदि इन संस्थानों में शिक्षण की गुणवत्ता अच्छी हुई और इसका लाभ अन्य प्रदेशों के विद्यार्थियों को मिलता है तो क्षमता का सदुपयोग ही होगा। फिलहाल ऐसा होता दिखाई तो नहीं देता। सरकारी कालेजों को छोड़ भी दें तो तमाम सख्ती के बावजूद महाविद्यालयों में विद्यार्थियों का टोटा है। गाइड और अनसाल्वड की बदौलत विद्यार्थी पास भी हो ही जाते हैं। गाइड छापने वाले, कालेज चलाने वाले और उच्च शिक्षा विभाग के गठजोड़ ने छत्तीसगढ़ को उच्च शिक्षा का ‘बैकयार्डÓ जो बना दिया है। जितना कचरा है यहां डंप किया जा सकता है।
Gustakhi Maaf: शून्य प्राप्तांक पर इंजीनियरिंग की सीट




