-दीपक रंजन दास
लोकतंत्र में नेता को या तो फूल मालाएं मिलती हैं या फिर गालियां. जिसका जैसा कामकाज होगा, जनता उसे वैसा ही तोहफा देगी. पर जनता अपना फैसला मुंह पर बहुत कम सुनाती है। उसका फैसला मतपेटी से होकर सामने आता है। तब तक माहौल बनाने का काम नेताओं का होता है। कई नेता जानबूझकर ऐसी टिप्पणियां करते हैं कि वह ब्रेकिंग न्यूज बन जाए। देश भर की राजनीति में बेलगाम बयानबाजों के खिलाफ एफआईआर हो रहे हैं। पहले ही लंबित मामलों के बोझ तले कराह रही अदालतों के लिए यह बिन बुलाई मुसीबत है। भई! मुक्केबाज बने हो तो नाक तो टूटेगी ही। कराटे-कुंगफू खेलते तो मुंह पर लात भी पड़ती। मल्लयुद्ध करते तो पछाड़े जाते, अखाड़े की मिट्टी में रगड़े जाते। कभी वो पीठ पर तो कभी आप पीठपर होते। पर यह तो राजनीति का अखाड़ा है। यहां उनकी भी बेइज्जती होती है जिनकी इज्जत संदिग्ध होती है। वह किसी पद पर हो तब तो बात ही कुछ और हो जाती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे पुलिस आपको गंदी-गंदी गालियां दे, मारे-पीटे तो देश का कोई कानून नहीं टूटता पर अगर आपने उसका हाथ भी पकड़ लिया तो आपके खिलाफ तमाम धाराएं लगाई जा सकती हैं। राजनीति की इस हालत के लिए उसमें पड़ी गंद जिम्मेदार है। गंद इतनी बढ़ चुकी है कि देश की लगभग 80 फीसद आबादी अब इनकी बातों पर ध्यान नहीं देती। युवाओं ने तो अखबार पढऩा तक छोड़ दिया है। वैसे भी उनके पास अपने मसले काफी हैं उन्हें मसरूफ रखने के लिए। ऐसे में नेता करे तो क्या करे? कभी वह फिल्मी सितारों को लाकर पार्टी की महफिल सजाती है तो कभी लोकप्रिय कलाकारों को सामने रखकर भीड़ जुटाती है। अब अधिकांश अभिनेता भी राजनीति का कोई भला नहीं कर पा रहे। युवा आते तो हैं, कलाकारों के साथ नाचते गाते भी हैं पर नेताओं के भाषण की एक लाइन भी नहीं सुनते। ऐसा सिर्फ राजनीति के पंडालों में है, ऐसा भी नहीं है। कालेजों और विश्वविद्यालयों में असली भीड़ केवल दो ही मौकों पर जुटती है – वार्षिकोत्सव और विदाई समारोह। यहां भी उनकी रुचि अतिथि और मुख्य अतिथि का भाषण सुनने में नहीं होती। वो तो इंतजार करते रहते हैं कि कब डीजे बजेगा और वो धमाल कर पाएंगे। स्टार प्रचारकों के बढ़ते खर्च और बेअसर भाषण के चलते अब नेताओं ने खुद ही ड्रामा करना शुरू कर दिया है। जो नेता परिचितों को देखकर अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया करते थे, अब वो सहानुभूति बटोरने के लिए थाने के सामने बैठकर रो रहे हैं। उन्हें शिकायत है कि प्रदेश के पुलिस थानों में गरीबों की रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। यह केवल आधा सच है। उन्हें तो शुक्र मनाना चाहिए कि कम से कम छत्तीसगढ़ पुलिस सड़कों पर न्याय नहीं करती। यहां केस सुलझाए जाते हैं, आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें न्यायालय के हवाले किया जाता है।





