-दीपक रंजन दास
देश की राजनीति एक अजीब दौर से गुजर रही है. आजादी के बाद एक बुरी तरह से टूटे-फटे, सदियों से शोषण उत्पीड़न से जर्जर देश को गढ़ने की जिम्मेदारी नेताओं पर थी. इसपर काम भी हुआ. सबका सहयोग भी मिला. देश के संविधान ने सत्ता, प्रशासन और नागरिकों के अधिकार और जिम्मेदारियां भी तय कर दीं. स्त्री पुरुष को समान अधिकार देने के साथ ही इस संविधान ने देश में रहने वाले सभी नागरिकों को समान अधिकार और सम्मान देने का भी रास्ता खोल दिया. पर इस आजादी का कुछ लोगों ने गलत मतलब निकाल लिया. राजे-रजवाड़े तो खत्म कर दिए गए पर नए-नए राजा उगते चले गए. अंग्रेजों से हमने केवल अंग्रेजी नहीं सीखी, केवल फूट की फसल काटना ही नहीं सीखा बल्कि इंसानों को जानवर समझने का नया फार्मूला भी हमें मिल गया. बावजूद इसके सत्ता ने हमेशा अपना ध्यान किसानों और गरीबों के लिए ही योजनाएं बनाने पर ही केन्द्रित रखा. इसका लाभ नीचे तक न जा पाया हो, यह एक अलग प्रसंग है. इसे लेकर भी समय-समय पर देश के नेतृत्व ने चिंता जताई है. पर इन दिनों जनहित कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है. 70 साल में देश इतना मजबूत तो ही चुका है कि आज हम अनाज की, दूध की, पाठशालाओं की, कालेजों की, अस्पतालों की चिंता से काफी हद तक मुक्त हो चुके हैं. अब राजनीति के नए मुद्दों की तलाश हो रही है. इतने विशाल और इतनी विविधताओं से भरे देश में कोई एक ऐसा नया मुद्दा क्या हो सकता था जो या तो वोट बैंक के रूप में काम करे या फिर वोटों का ध्रुवीकरण रोकने के काम आए. हिन्दू राष्ट्र का शिगूफा यहीं से उठा. एक पार्टी रातों रात हिन्दुओं की पार्टी बनकर उभरी. खुद को हिन्दू प्रमाणित करने के लिए उस पार्टी का समर्थन करना जरूरी होने लगा. जाहिर है कि जब हिन्दुत्व इतना बड़ा मुद्दा हो जाएगा तो यही राजनीति का केन्द्र भी बन जाएगा. विपक्षी दल भी काम-काज छोड़कर हिन्दुत्व के एजेंडे को ही आगे बढ़ाने में लग जाएंगे. स्टेशन पर हनुमान चालीसा, मैदानों में रामायण महोत्सव के आयोजनों की बाढ़ आ जाएगी. दरअसल, धर्म राजनीति की पीठ पर होनी चाहिए. धर्म जब राजनीति का चेहरा हो जाएगा तो राजनीति का स्वाहा होना तय है. जिन प्रभु श्रीराम को सामने रखकर इस धर्म आधारित राजनीति की शुरुआत की गई थी, स्वयं उन्होंने भी अपने जीवन में पुत्रधर्म, राजधर्म और क्षत्रिय धर्म का पालन किया. यह पूजा पाठ से विलग था. उन्हें जरूरत पड़ी तो बालुका शिवलिंग बनाकर पूजा कर ली. यह उनकी व्यक्तिगत आस्था थी. इसीलिए उन्हें पुरुषोत्तम कहा गया. महाभारत काल में भी अर्जुन को श्रीकृष्ण ने धर्म का उपदेश दिया. यदि सत्ता भी अपने सारे काम छोड़कर पूजा-पाठ-प्रवचन की पैरोकारी करने लगे तो वे खुद-ब-खुद अप्रासंगिक हो जाएंगे. बेहतर होगा कि हिन्दू समाज को संगठित करने के बेहतर विकल्पों की तलाश की जाए.
Gustakhi Maaf: जब यूं ही होने लगे शासन का काम




