-दीपक रंजन दास
कहते हैं एक सोच दुनिया को बदलने की ताकत रखती है. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है रायपुर मुख्य डाकघर के वरिष्ठ डाकपाल ने. अधिकांश सरकारी दफ्तरों की तरह यहां भी लोग देर से आते थे. पिछले महीने वरिष्ठ डाकपाल केपी वर्मा तबादले पर यहां पहुंचे. उन्होंने देखा कि यहां के 75 डाकिए और लगभग 100 अधिकारी कर्मचारी कभी भी समय पर नहीं आते. डाकियों के पहुंचने के लिए 9 बजे का वक्त मुकर्रर है जबकि अधिकारियों को भी 10 बजे तक अपना काम संभाल लेना चाहिए. उन्होंने डाकियों के लिए 8.58 और शेष कर्मचारियों के लिए 9.58 बजे राष्ट्रगान की व्यवस्था बना दी. थोड़े दिनों तक तो असमंजस की स्थिति बनी रही. कोई राष्ट्रगान के बीच में डाकघर पहुंचता, तो कोई विलंब से. उन्हें बड़ी आत्मग्लानि होती. कुछ ही दिनों में सभी तय वक्त से 5 मिनट पहले डाकघर पहुंचने लगे. वैसे लेटलतीफी, अकेले डाकघर की मुसीबत नहीं है. अंग्रेजों के जाने के बाद चार-पांच दशकों तक तो लोग वक्त के पाबंद बने रहे. इसके बाद की पीढ़ियों ने वक्त की परिभाषा ही बदल दी. लेट आना फैशन की तरह हो गया. लोग यहां तक कहते पाए गए कि जल्दी जाकर झाड़ू थोड़े ही लगाना है. वो कहते, हमेशा वक्त पर पहुंचो तो वैल्यू खत्म हो जाती है. फिर तो लोग जानबूझकर लेट आने लगे. इसे ठीक करने के लिए आरएफआईडी कार्ड और थंब मशीन तक लगाए गए, पर व्यवस्था में कोई खास सुधार नहीं हुआ. दरअसल, पाश्चात्य सिस्टम में भावुकता का ध्यान नहीं रखा जाता. इंसानों की चौकीदारी के लिए मशीनों का उपयोग किया जाता है. भारतीय उपजाऊ खोपड़ी इसे चकमा देना खूब जानती है. चार-चार आरएफआईडी कार्ड लेकर चपरासी दफ्तर पहुंचता है. सबका अटेंडेंस लग जाता है. जहां अंगूठा लगाना जरूरी होता है, लोग समय पर आकर अंगूठा लगा देते हैं और फिर अपना निजी काम निपटाने लगते हैं. बैंकों में, जहां समय पर अपने-अपने कम्प्यूटर पर लॉग-इन करना पड़ता है, वहां भी लोग कम्प्यूटर चालू करके पीछे किसी मेज पर या किसी और कमरे में घेरा डाल लेते हैं. एक समय था जब छाता और झोला हाजिरी लगाया करते थे. लोग दफ्तर पहुंचकर अपनी कुर्सी पर छाता-झोला टांग दिया करते थे. लोग इसे देखकर ही समझ जाते थे कि बाबू आ गए हैं. डाक बाबू ने इसका देसी हल ढूंढ निकाला. भारतीय चाहे कितना भी भ्रष्ट हो, तिरंगा और बापू की फोटो देखते ही उसकी भारतीयता जाग जाती है. नौ बजे से पहले बिस्तर नहीं छोड़ने वाला आलसी भी 15 अगस्त और 26 जनवरी को सुबह 6 बजे नहा लेता है. राष्ट्रगान शुरू होते ही वह कंधा पीछे-पेट बाहर वाली मुद्रा में तन कर खड़ा हो जाता है. काम काज को लेकर भी वह संजीदा हो जाता है. कितनी अच्छी बात है. काश! पुलिस थानों में भी ऐसी ही व्यवस्था हो जहां साहब के इंतजार में फरियादी लगभग पूरा दिन बेंचों पर बैठे रह जाते हैं.





