-दीपक रंजन दास
कांग्रेस के 85वें राष्ट्रीय अधिवेशन में उन सभी बातों पर चर्चा हुई जिनपर देश के बौद्धिक वृत्तों में चर्चा होती रही है। सोनिया गांधी ने भारत-जोड़ो यात्रा का उल्लेख करते हुए सक्रिय राजनीति से संन्यास का इशारा किया। उन्होंने पार्टी के नए अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े का भी उल्लेख किया। तय है कि कांग्रेस को फिलहाल राहुल और खडग़े की युति आगे बढ़ाएगी। इसके साथ ही पार्टी के सभी पदों पर 50 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गई। 50 फीसदी पदों पर अब केवल 50 से कम उम्र के लोगों को ही नियुक्ति किया जा सकेगा। इससे राजनीति में युवाओं को ज्यादा मौका मिलेगा। एआईसीसी को लोगों के और करीब लाने के लिए अब सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को डेलीगेट्स और प्रत्येक छह डेलीगेट्स पर एक एआईसीसी सदस्य चुना जाएगा। इससे एआईसीसी के सदस्यों की संख्या 1240 से बढ़कर 1653 हो जाएगी। पार्टी ने देश में नफरत की राजनीति करने वालों पर नकेल कसने के प्रावधानों पर भी चर्ची की। छत्तीसगढ़ की किसान न्याय योजना और राजस्थान की चिरंजीवी योजना को देश भर में लागू करने का संकल्प भी लिया गया। सरकारी नौकरी के लिए आवेदन शुल्क को समाप्त करने,10वीं 12वीं के विद्यार्थियों को वजीफा देने जैसी योजनाओं को भी कांग्रेस ने अपनी रणनीति में शामिल किया है। पार्टी इन कदमों के द्वारा लोगों के बीच अपनी खोई हुई जमीन तलाश करने का प्रयास करेगी। अधिवेशन में मौजूदा हालातों का मुकाबला करने के लिए जो सबसे बड़ी बात कही गई वह है दलबदल पर नकेल कसने की। 2014 के बाद बड़े पैमाने पर योजनाबद्ध ढंग से दलबदल करवाया गया। चुनी हुई सरकारों को गिराया गया। इससे छोटे-बड़े सभी राजनीतिक दल परेशान हैं। कांग्रेस इस परिपाटी पर अंकुश लगाने के लिए संविधान में संशोधन करेगी। विधायकों-सांसदों की खरीद फरोख्त रोकने के लिए पार्टियां अपने ही लोगों का अपहरण कर उन्हें किसी होटल या रिसॉर्ट में कैद करती रही हैं। ईडी-आईटी-सीबीआई के छापों का भी सहारा जनप्रतिनिधियों को डराने-धमकाने और दल-बदल करवाने के लिए किया जाता रहा है। कारपोरेट जगत ने ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए काफी पहले ही अपनी रणनीति तैयार कर ली थी। वहां कोई बड़ी जिम्मेदारी देने से पहले, लोगों से बाण्ड भरवाया जाता है। नौकरी छोडऩे से पहले दो या तीन महीने का नोटिस देना होता है। नौकरी छोडऩे के बाद भी एक निश्चित अवधि तक निकटतम प्रतिद्वंद्वी संस्थान से नहीं जुडऩे की शर्त रखी जाती है। कोई भी संस्था अपने मानव संसाधन को प्रतिस्पर्धी बनाने और प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में काफी वक्त और पैसा खर्च करती है। वह उसे मौके देती है, उसके सही-गलत फैसलों का नफा-नुकसान भी झेलती है। संस्था इसे निवेश मानकर चलती है। वह अपने निवेश को यूं ही बेकार नहीं जाने दे सकती। दल-बदल विरोधी कानून में इसी तरह के प्रावधान हो सकते हैं। यह मुद्दा उठाकर कांग्रेस विपक्षी दलों का नेतृत्व करने की दिशा में भी आगे बढ़ गई है।
Gustakhi Maaf: कांग्रेस के ये फैसले हो सकते हैं गेमचेंजर



