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Gustakhi Maaf: अब तो झूठ के भी निकल आए हैं पांव

By Om Prakash Verma
Published: March 27, 2025
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
कहावत है कि झूठ के पैर नहीं होते। पर यह कहावत अब पुरानी पडऩे लगी है। झूठ के न केवल पैर होते हैं बल्कि वह सरपट भागता भी है। कभी-कभी तो झूठ ही सच हो जाता है। लोग उसे ही सच मान लेते हैं जिसे बार-बार कहा जाता है। फर्क इस बात का भी पड़ता है कि वह क्या सुनना, समझना या मानना चाहता है। बात उसके मतलब की हो तो उसकी मुंडी तुरन्त हामी भरने लगती है। कुछ बड़े-बड़े झूठ तो पिछले 10-15 साल से चल रहे हैं। इनमें से प्रमुख है कांग्रेस शासन काल में देश ने तरक्की नहीं की। आजादी के बाद भारत के हिस्से में लगभग 11265।41 किलोमीटर रेलवे ट्रैक आए थे। 2014 तक इनकी कुल लंबाई लगभग 66 हजार किलोमीटर हो चुकी थी। 1947 में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई लगभग 21,378 किलोमीटर थी, जो अब बढ़कर 1।40 लाख किलोमीटर से अधिक हो गई है। भारत में अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क है, जिसकी कुल लंबाई लगभग 62 लाख किलोमीटर है। 1951 में लगभग 13 हजार प्राथमिक और 7,000 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय थे। साक्षरता दर 12 प्रतिशत थी, जो आज 74 प्रतिशत से अधिक है। 2021-2022 तक देश में कुल 14 लाख 89 हजार 115 स्कूल चल रहे थे। इनमें सरकारी स्कूलों की संख्या 10 लाख 22 हजार 386 थी। विश्वविद्यालयों की बात की जाए तो स्वतंत्रता के समय 27 विश्वविद्यालय थे, जो आज बढ़कर 760 हैं। विकास का सबसे सुगम और सरल पैमाना है लोगों की जीवन प्रत्याशा। आजादी के समय भारत की आबादी 34 करोड़ थी जो आज 140 करोड़ के पार जा चुकी है। इसका सीधा सा मतलब यही है कि लोग भरपेट खा रहे हैं, उनका साधारण स्वास्थ्य बेहतर है, उन्हें चिकित्सा सुविधाएं मिल रही हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, राष्ट्रीयकृत बैंक, बांध, आधारभूत उद्योग, आईआईटी, आईआईएम, एम्स, इसरो, जैसे संस्थानों की स्थापना भी उसी दौरान हुई जिसके बारे में कहा जाता है कि सरकार ने कुछ नहीं किया, सिर्फ अपनी जेबें भरीं। पर लोग मान रहे हैं कि कांग्रेस शासनकाल में देश में कोई काम हुआ ही नहीं। इसमें वो लोग भी शामिल हैं जो सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों में अंगूठा लगाकर वेतन लेते थे। आज उनके बाद की दो पीढिय़ां उच्च शिक्षित और सुस्थापित हैं। सबसे बड़ा झूठ यह है कि हिन्दू खतरे में है। इस नारे के साथ देश की आबादी का जो ध्रुवीकरण हो रहा है, वह किसी भी स्वस्थ राष्ट्र के लिए उचित नहीं हो सकता। हिन्दू तब खतरे में नहीं था जब यहां मुगलों का शासन था, वह तब भी खतरे में नहीं था जब यहां अंग्रेजों का शासन था। आजादी के बाद हिन्दुओं, मुसलमानों और ईसाइयों ने मिलकर देश को आगे बढ़ाया। अगर कहीं कुछ गलत हो रहा है तो सरकार को उसे ठीक करना चाहिए। पर इसके लिए पूरी कौम को जिम्मेदार ठहराना कैसे उचित है?

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