-दीपक रंजन दास
आज कल सबकुछ ज्यादा-ज्यादा करने का चलन हो गया है. इसका असर शादी-ब्याह से लेकर स्कूल कालेज के मामूली कार्यक्रमों तक में देखने को मिलता है. ऐसे ही आयोजनों में से एक है सम्मान समारोह. सम्मान करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है. कौन किसका सम्मान कर रहा है, कितने लोगों का सम्मान कर रहा है यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. ज्यादा से ज्यादा लोगों का सम्मान करने के चक्कर में कभी-कभी एक ही मंच पर ऐसे दो लोगों का एक साथ सम्मान हो जाता है जिनके स्तर में कोई मेल नहीं. गिनती पूरी करने के लिए किसी को भी बुला लिया जाता है. सम्मानित होने वालों में वो लोग भी शामिल होते हैं जिनके परिवार ने सम्मान समारोह को फाइनेंस किया होता है. इसी तरह ज्यादा-ज्यादा करने के चक्कर में लोग मंच सज्जा पर भी खूब खर्च कर रहे हैं. इस चक्कर में बड़ा घालमेल भी हो रहा है. दुख तब होता है जब बच्चों को शिक्षित और संस्कारित करने वाली शैक्षणिक संस्थाएं भी इस चूहा दौड़ में शामिल हो जाते हैं. कुछ समय से डिजिटल बोर्ड का उपयोग बहुत बढ़ गया है. लोग स्टेज के पीछे डिजिटल बोर्ड लगवा लेते हैं. जब तक मंच खाली होता है, इसपर वीडियो चलता रहता है. पर जब मंच पर लोग रहते हैं तब इसपर ‘मेज’ चला दिया जाता है. यह डिजिटल बोर्ड का बेहद फूहड़ प्रयोग है. इसके चलते मंच पर खड़े लोगों का मुंह दर्शकों को दिखाई देना बंद हो जाता है. उनकी आंखें डिजिटल स्क्रीन से आ रही रोशनी से चुंधिया जाती हैं. पर किसी को क्या फर्क पड़ता है. शादी ब्याह की रस्मों में कई ऐसे बेतुके कार्यों को शामिल कर लिया गया है जिसका किसी से कोई लेना देना नहीं. एक ऐसा ही दिखावा है शादी के भारी भरकम कार्ड. एक ऐसा ही कार्ड अभी मेरे हाथ में है. कार्ड क्या है पूरा गिफ्ट पैक है – बस फर्क यह है कि इसका कोई दूसरा उपयोग नहीं है. न फेंकने को मन करेगा और न ही किसी काम आएगा. डब्बे के भीतर डब्बा और हर डब्बे में एक कार्ड. कुछ समय पहले एक शादी की पार्टी में जाना हुआ. विशाल मैदान के चारों तरफ स्टाल. मॉकटेल, छाछ, केसर दूध, सलाद, गुपचुप, चाट, दोसा, लिट्टी-चोखा, वेज खाना, नॉनवेज खाना और अंत में दारू. सबकुछ छोड़कर लोग दोसा, गर्म तवा रोटी और तवा सब्जी के स्टाल पर लाइन लगाए खड़े थे. इतना खर्च करने के बाद भी यदि खाने के लिए लाइन लगाना पड़े तो क्या मतलब. और जब लोगों को खाना ही दोसा, चाउमीन, लिट्टी चोखा है तो इतने सारे व्यंजन परोसने की क्या जरूरत. एक तरफ यह फिजूलखर्ची वाला भारत है तो दूसरी तरफ कुछ धार्मिक संस्थान और सामाजिक संगठन फिजूलखर्ची पर रोक लगाने का आह्वान कर रहे हैं. पर इसे तब तक सफलता नहीं मिल सकती जब तक शिक्षण संस्थान इसमें अपनी भागीदारी न दें.





