-दीपक रंजन दास
प्रेम और जिहाद एक दूसरे के विपरीत अर्थ वाले शब्द हैं. ये कभी एक नहीं हो सकते. लव-जिहाद कपटी दिमाग की उपज है. प्रेम कोई भी, किसी से भी कर सकता है. कृष्ण भक्तों में एक बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की है. उनके भाव देखने हों तो इस्कॉन के मंदिर जाकर देख सकते हैं. उन्हें देखकर वर्णांधों और धर्मांधों की आंखें खुल जाएंगी. जब अमेरिकी राष्ट्रपति हनुमान जी की मूर्ति उठाते हैं, हनुमान चालीसा पढ़ते हैं तो हमारा हृदय गदगद हो जाता है. पर जब कोई भारतीय भाई चर्च में प्रार्थना करता है तो हमें मिर्ची लग जाती है. कष्ट तब ज्यादा होता है जब समाज को राह दिखाने वाले साधु और साध्वी उलटी पुल्टी भाषा बोलने लगते हैं. साध्वी प्राची ने कहा कि संस्कारों से लव जिहाद पर रोक लगेगी. इन संस्कारों का अब तक का जो अनुभव भारतीय समाज का है वह प्रेम पर रोक का ही है. जिहाद के खिलाफ ही जिहाद हो सकता है. सो हो रहा है. साधुओं के सम्मेलन में साधुओं ने कहा कि हिन्दुओं को भी एक हाथ में शास्त्र और दूसरे हाथ में शस्त्र रखना चाहिए. उन्होंने दलील दी कि हमारे भगवान भी हाथ में अस्त्र शस्त्र उठाए रहते हैं. यह और बात है कि आधुनिक भारत को यह फैसला करना है कि वे उन्नति करना चाहते हैं या गली मोहल्लों में मारपीट करते फिरना चाहते हैं. माना कि भारत को लूटने के लिए जो लुटेरे और आततायी आए, वे इस्लाम को मानने वाले थे. मगर भारत ने उन्हें अपने मोहपाश में बांध लिया. वे यहीं के होकर रह गए. उनकी कई पीढ़ियों ने यहां शासन किया तो अंग्रेजों के आने के बाद कई पीढ़ियों ने यहां गुलामी भी की. पर यह सब इतिहास है. आजाद भारत में सभी केवल भारतीय नागरिक हैं. सेना में शामिल होकर वो भी शीश कटाते हैं, शहादत देते हैं. वे डाक्टर, वकील, नर्स, शिक्षक, प्रोफेसर – वह सबकुछ हैं जो एक नागरिक को होने का अधिकार है. भगवान के हाथ में जिन संतों को केवल अस्त्र-शस्त्र दिखता है, काश उन्होंने यह भी देखा होता कि भगवान का एक हाथ हमेशा अभय मुद्रा में होता है. यह अभयदान उनके लिए है जो नेक कार्य करते हुए अपना जीवन यापन करना चाहते हैं. पृथ्वी पर जब-जब धर्म की हानि हुई है भगवान श्रीविष्णु ने स्वयं अवतार लिया है. तब मुसलमान और ईसाई नहीं थे. फिर कौन सा धर्म था जिसकी रक्षा ईश्वर करना चाहते थे. इसे समझना होगा. ईश्वर ने उन लोगों का ही संहार किया जो स्वयं को भाग्यविधाता समझ बैठे थे. समझदारों को इशारा काफी होता है. श्रीविष्णु सृष्टि के पालनहार हैं. उनका चक्र काल का परिचायक है. काल का चक्र घूमता है तो जो आदि है, जो सनातन है, वह लौट कर आ जाता है. सनातन में मनुष्य को यह अधिकार था कि वह जो चाहे खा सके, जिसकी चाहे, जैसे चाहे उपासना कर सके.
Gustakhi Maaf: प्रेम कभी जिहाद नहीं हो सकता




