-दीपक रंजन दास
बच्चे तो बच्चे, स्कूल-कालेज से लेकर माता-पिता तक वार्षिक परीक्षाओं को लेकर परेशान रहते हैं. पूरा देश मार्च से मई तक ‘एक्जाम मोड’ में रहता है. परीक्षा की तैयारी कैसे करें, क्या खाएं-क्या न खाएं, कब सोएं, कब जागें का ज्ञान देने के लिए भांति-भांति के मोटिवेशनल स्पीकर्स घूम रहे हैं. बच्चे अच्छी तैयारी कर रहे हैं. बावजूद इसके कोई फेल हो रहा है तो कोई बार्डर लाइन पर टिक रहा है. दिक्कत तब बढ़ जाती है जब मामला दसवीं-बारहवीं बोर्ड का हो. यहां प्रतिशत का मामूली अंतर बच्चों का दिल तोड़ सकता है, उनका भविष्य चौपट कर सकता है. अगर गलती परीक्षक की हो, कापी जांचने वाले की हो, तो स्थिति गंभीर हो जाती है. छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने अपने 163 शिक्षकों को मूल्यांकन कार्य से अलग कर दिया है. ये शिक्षक 10वीं और 12वीं कक्षा की उत्तर पुस्तिकाएं जांचते थे. 2020 में ली गई वार्षिक परीक्षा के मूल्यांकन में इन शिक्षकों ने हद दर्जे की लापरवाही बरती थी. जब बच्चों ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन लगाया तो किसी-किसी परीक्षार्थी के प्राप्तांक 20 से 50 तक बढ़ गए. जाहिर है इन मूल्यांकर्ताओं का शिकार हुए सभी विद्यार्थियों ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन नहीं किया होगा. भिन्न-भिन्न कारणों से ऐसे अधिकांश बच्चों ने जो मिला उसे ही स्वीकार कर लिया होगा. दरअसल, परीक्षा का पूरा काम एक ढर्रे पर चल रहा है. 4-6 पेज के प्रश्न पत्र में आधा दर्जन तक गलतियां हो जाती हैं. प्रूफरीडिंग तक नहीं होती. सिलेबस से बाहर के प्रश्न पूछ लिये जाते हैं. गोपनीयता के नाम पर प्रश्नपत्र बोर्ड से थाने और फिर वहां से स्कूल पहुंचते हैं. किसी तरह बच्चे ने प्रश्नों को समझकर उत्तर लिख भी दिया तो उसे नंबर मिलना न मिलना मूल्यांकनकर्ता के मूड और सेहत पर निर्भर करता है. ऊपर से दबाव यह कि रिजल्ट जल्द से जल्द घोषित करना है. विभाग के रिकार्ड बनाने के चक्कर में न जाने कितने मासूमों के सपनों का खून हो जाता है. अब तो लगता है कि प्रश्नपत्र के साथ एक आदर्श उत्तरपुस्तिका भी मूल्यांकनकर्ता को उपलब्ध करा देना चाहिए. अभी अधिकांश मूल्यांकनकर्ता ठीक-ठाक नंबर देने में यकीन करते हैं. कुछ कमजोर बच्चों का साल बर्बाद होने से बचाने की कोशिश करते हैं. वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपनी ओवरस्मार्टनेस दिखाने के चक्कर में खूब नंबर काटते हैं. इससे न केवल शिक्षा के औचित्य और मूल्यांकन की एकरूपता पर सवाल खड़े हो रहे हैं बल्कि ‘एक्जाम फीयर’ नाम की एक नई बीमारी पैदा हो गई है. परीक्षार्थी मेहनत करके उत्तर तो लिख सकता है पर कापी जंचने के लिए किसी ढंग के मूल्यांकनकर्ता के पास जाए इसके लिए नारियल चढ़ाने के अलावा वह कर भी क्या सकता है. परीक्षा केन्द्र से लेकर मूल्यांकनकर्ता तक सब की नजर सिर्फ अपने हिस्से की बोटी पर होती है. देश के कथित भविष्य की फिक्र ही किसे है।
Gustakhi Maaf: परीक्षाओं का तमाशा बन कर रह गया




