-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा विभाग ने अंगड़ाई ली है। 40 साल बाद यहां कोर्स में परिवर्तन किया गया है। पाठ्यक्रम बदला है, अध्यापन और मूल्यांकन का तरीका भी बदला है। इससे न केवल विद्यार्थी बल्कि प्राध्यापकों को भी पढ़ाई करनी पड़ेगी। पूरे सत्र के दौरान अध्यापन, असाइमेंट, मूल्यांकन और ग्रेड पाइंट्स का दौर चलता रहेगा। नॉन अटेंडिंग स्टूडेंट्स को भी लगातार कालेज में अपनी शक्ल दिखानी पड़ेगी। नया कोर्स सरकारी, निजी और ऑटोनॉमस सभी कॉलेजों में लागू होगा। दावा किया गया है कि नया सिलेबस रोजगार मूलक होगा। डिप्लोमा, डिग्री, ग्रेजुएशन या किसी भी स्तर का कोर्स पूरा करने पर कोई न कोई काम मिल ही जाएगा। नए सिलेबस में किताबी ज्ञान के साथ व्यावहारिक ज्ञान को जोड़ा गया है। कंप्यूटर कोर्स अब सभी पाठ्यक्रमों का अनिवार्य हिस्सा होगा। ऑनर्स का कोर्स करने वाले ही पीएचडी कर सकेंगे। ऑनर्स 75 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण करना होगा। अपर संचालक डॉ। एचपी खैरवार द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि, ऑटोनॉमस कॉलेजों में सेमेस्टर प्रणाली और बाकी कॉलेजों में परीक्षा प्रणाली लागू होगी। नए सिलेबस में ग्रेड सिस्टम है। विद्यार्थी को लगातार असाइनमेंट मिलेंगे। प्रत्येक यूनिट टेस्ट में क्रेडिट माक्र्स मिलेंगे। असाइनमेंट में नंबर नहीं लाए तो इसका असर वार्षिक नतीजों पर पड़ेगा। 1986 के बाद किये गये इन बदलावों को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि इससे महाविद्यालय परिसरों में रौनक लौटेगी। खुद को लगातार अपडेट करने वाले अध्यापकों को पढ़ाने में ज्यादा आनंद आएगा। पर यह सिस्टम उन पर भारी पड़ेगा तो ‘करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान’ के पैटर्न पर चल रहे थे। कालेज ही क्यों, ट्यूशन उद्योग भी इसी पर चलता रहा है। विद्यार्थियों को रटा-रटा कर अच्छे अंक दिलाने के इस धंधे ने नवोन्मेषी अध्ययन-अध्यापन को हाशिए पर धकेल दिया था। वही कोर्स, वही नोट्स, वही अनसाल्व्ड, वही-वही सवाल, वही-वही जवाब और जांचने का भी वही ढर्रा। असाइमेंट विद्यार्थियों को सेल्फ-स्टडी के लिए प्रेरित करेगा और लिखने और विषय को प्रस्तुत करने का अभ्यस्त बनाएगा। उम्मीद है कि इससे विद्यार्थियों के भाषा ज्ञान में सुधार होगा और लेखन शैली में भी सुधार होगा। अभी तो हाल यह है कि 50 प्रतिशत विद्यार्थी ऐसे होते हैं, जिनकी कापी जांचने के लिए परीक्षक को ग्लूकोज पानी की बोतल लेकर बैठना पड़ता है। प्रदेश में ऑनर्स पर पहली बार जोर दिया गया है। ऑनर्स के साथ ग्रेजुएशन की इच्छा रखने वालों को उन राज्यों की ओर पलायन करना पड़ता था, जहां के विश्वविद्यालय इसका अवसर प्रदान करते हैं। जिन्हें उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापन के लिए जाना है, उनके लिए ऑनर्स अनिवार्य हो जाएगा। छोटी-मोटी दिक्कतें हर बदलाव के साथ जुड़ी होती हैं। पर भविष्य को देखते हुए इन बदलावों का स्वागत करना चाहिए। चौपट पड़ी उच्च शिक्षा को संभालने के लिए ये बदलाव जरूरी हैं ताकि बच्चे कालेजों की ओर लौटें। सेमीनार, कार्यशाला और अतिथि अध्यापकों का लाभ लें।





