श्रीकंचनपथ न्यूज डेस्क
भिलाई। छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने के बाद यहां विधानसभा के कुल 4 चुनाव हुए, जिनमें से 3 चुनाव जीतकर भाजपा ने सरकार बनाई, लेकिन इन तीनों ही चुनावों में 90 सीटों वाले राज्य में भाजपा को कभी 50 से ज्यादा सीटें नहीं मिल पाई। सत्ता के मद में चूर रहे भाजपा के नेताओं ने यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि क्यों राज्य का एससी-एसटी वोटर लगातार उसका साथ छोड़ता रहा? वहीं, पीछे छूट रहे ओबीसी वोटर्स को भी साथ लेने की कोई कोशिश नहीं की गई। इसके विपरीत इन समाजों से जुड़े अग्रणी नेताओं को लगातार ठिकाने लगाने की व्यूह-रचना होती रही, ताकि सत्ता में भागीदारी से बचा जा सके। तथाकथित विकास का महिमामंडन कर भाजपा हर बार चुनाव लड़ती रही और अंत में नतीजा यह निकला कि वह महज 15 सीटों तक सिमटकर रह गई।

छत्तीसगढ़ विधानसभा की कुल 90 सीटों में से 39 सीटें एससी-एसटी के लिए आरक्षित हैं। इनमें एससी की 10 और एसटी की 29 सीटें शामिल है। माना जाता रहा है कि यही 39 सीटें सत्ता तक पहुंचने का मार्ग होती हैं। आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। 2018 के पिछले चुनाव में कांग्रेस ने इन्हीं सीटों की बदौलत प्रदेश में अभूतपूर्व बहुमत के साथ सरकार बनाई। कांग्रेस को एसटी आरक्षित 29 सीटों में से 25 पर एकतरफा जीत मिली। वहीं एससी आरक्षित 10 सीटों में से 7 पर सफलता हासिल हुई। इन्हीं की बदौलत कांग्रेस 68 सीटों पर जीत का परचम लहरा पाई। प्रदेश में एसटी वोटर्स करीब 32 फीसद है, जो बहुधा बस्तर और सरगुजा जैसे पहाड़ी इलाकों में बसते हैं। 2013 के चुनाव में कांग्रेस को एसटी की 29 सीटों में से 18 पर जीत हासिल की थी। बावजूद इसके पार्टी सत्ता से दूर रही। भाजपा को तब 11 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन 2918 के चुनाव ने उसे महज 3 सीटों पर समेट दिया।
राज्य में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर विजय को सत्ता प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2008 के चुनाव में भाजपा ने राज्य में 50 सीटों पर विजय प्राप्त की थी और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 29 सीटों में से 19 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाई थी। तब कांग्रेस को इन सीटों में से केवल 10 सीटों पर ही जीत मिली थी। लेकिन विगत चुनाव में राज्य में भाजपा के कई वरिष्ठ आदिवासी नेता चुनाव हार गए। इस चुनाव में बीजापुर सीट से वन मंत्री महेश गागड़ा, नारायणपुर सीट से स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप और प्रतापपुर सीट से गृहमंत्री रामसेवक पैकरा को हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह 2018 में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी कांग्रेस को जीत मिली। कांग्रेस ने 10 आरक्षित सीटों में से सात पर जीत हासिल की। राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग की जनसंख्या लगभग 12 फीसद है और इसमें से सतनामी वर्ग मैदानी राजनीति को प्रभावित करते हैं। वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 में से नौ सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन 2018 में केवल दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। भाजपा ने मस्तुरी और मुंगेली सीट पर जीत हासिल की, जबकि बहुजन समाज पार्टी एक सीट पामगढ़ से जीती। राज्य में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में नवागढ़ से सहकारिता मंत्री दयालदास बघेल चुनाव हार गए।
आदिवासियों ने नकारा
2013 में आदिवासी समाज के लिए सुरक्षित 29 सीटों में से 17 पर कांग्रेस को जीत हासिल हुई थी। 12 सीटें भाजपा के पास थीं। आदिवासी बहुल बस्तर में तो मामला एकतरफा था। यहां की आठ सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा किया। वहीं सरगुजा की 9 आदिवासी सीटों में से 5 का परिणाम भाजपा के पक्ष मेंं और 4 का कांग्रेस के पक्ष में गया था। इसके उलट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 सीटों में से केवल एक मस्तूरी पर कांग्रेस का उम्मीदवार विजयी हुआ। शेष 9 भाजपा के खाते में गई। अजा वर्ग में खास जनाधार रखने वाली बसपा को भी एक भी सुरक्षित सीट नहीं मिली। बसपा का एकमात्र विधायक जैजैपुर की सामान्य सीट पर जीता। 2013 के मुकाबले 2018 में भाजपा के हालात बेहद खराब रहे। न केवल बस्तर अपितु सरगुजा से भी उसका सूपड़ा साफ हो गया। आदिवासियों ने भाजपा को पूरी तरह से नकार दिया।
49-50 के इर्द-गिर्द
प्रदेश में भाजपा को लगातार तीन बार सरकार बनाने का अवसर मिला और तीनों ही बार भाजपा कभी भी 50 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई। 2003 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 50 सीटें हासिल हुई थी। इसके अगले चुनाव 2008 में भी पार्टी को इतनी ही सीटें मिली। जबकि 2013 में उसकी एक सीट घटकर कुल सीटें 49 रह गयी। शायद इसीलिए 2018 चुनाव से ठीक पहले शीर्ष संगठन ने प्रदेश को 75 प्लस का लक्ष्य दिया था। हालांकि जब चुनाव के नतीजे आए तो भाजपा महज 15 सीटों पर सिमट चुकी थी। इसके पीछे केन्द्र की मोदी सरकार की नोटबंदी और व्यापारिक नीतियां तो जिम्मेदार थी हीं, वहीं राज्य सरकार के कई फैसले भी उसके खिलाफ गए। खासतौर पर सरकार के स्वयं शराब बेचने के फैसले और उसकी प्रक्रियाओं ने लोगों को नाराजगी से भर दिया। भाजपा ने एक बड़े वर्ग को वोट खोया, तो उसकी बड़ी वजह यही रही।
45 सीटें ओबीसी के प्रभाव में
बात सिर्फ एससी-एसटी वोटर्स तक ही सीमित नहीं है। दरअसल, भाजपा ओबीसी वोटर्स को साधने में भी लगातार नाकाम रही। यदि पार्टी सत्ता में रहते इसी एक वर्ग को थाम लेती तो शायद नतीजे कुछ और होते। बहरहाल, छत्तीसगढ़ में करीब 45 सीटें ऐसी है, जहां के चुनाव नतीजों पर ओबीसी फैक्टर काम करता है। शायद इसीलिए केन्द्र की मोदी सरकार ने ओबीसी पर बड़ा दांव खेला तो उसे भुनाने के लिए पार्टी के नेता गांव-गांव पहुंच गए। वहीं भूपेश बघेल की अगुवाई वाली प्रदेश सरकार ने भी ओबीसी आरक्षण बढ़ाकर 27 फीसद कर दिया। हालांकि मामला कानूनी पचड़े में फंस गया। अब दोनों ही प्रमुख दल अपने-अपने स्तर पर ओबीसी वोटर्स पर फोकस कर रहे हैं। बस्तर चिंतन के बाद भाजपा ने चुनाव अभियान छेड़ दिया है और उसके चिंतन के निचोड़ में एससी-एसटी और ओबीसी वोटर ही है।




