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क्लस्टर खेती और विविधीकरण से सँवरेगा वनांचल के किसानों का भविष्य

By Poonam Patel
Published: May 24, 2026
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धान के साथ अब फल, सब्जी और पशुपालन से बढ़ेगी किसानों की आय, तैयार हुआ त्रिविभागीय रोडमैप
धान के साथ अब फल, सब्जी और पशुपालन से बढ़ेगी किसानों की आय, तैयार हुआ त्रिविभागीय रोडमैप
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रायपुर। छत्तीसगढ के नारायणपुर जिले के विकासखंड ओरछा के सुदूर ग्राम कच्चापाल के पारंपरिक परिवेश (घोटूल) में हाल ही में विकास की एक नई इबारत लिखी गई। यहाँ जब कृषि, उद्यानिकी और पशुपालन विभाग के अधिकारी और स्थानीय ग्रामीण एक साथ जमीन पर बैठे, तो उनका मकसद सिर्फ सरकारी योजनाओं का प्रचार करना नहीं, बल्कि वनांचल के किसानों की तकदीर और तस्वीर बदलने का एक साझा संकल्प था। राज्य शासन की मंशा के अनुरूप, अंदरूनी क्षेत्रों के किसानों को आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए यहाँ एक विशेष बैठक और मैदानी संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह रणनीतिक पहल किसानों को संगठित और विविधीकृत कृषि पद्धतियों से जोड़कर उनकी आय को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

क्लस्टर आधारित खेती- कम लागत में अधिक मुनाफे का मंत्र

मैदानी संवाद के दौरान विभागीय अधिकारियों ने पारंपरिक ढर्रे से हटकर आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने पर विशेष जोर दिया। किसानों को समझाया गया कि अलग-अलग बिखर कर खेती करने के बजाय क्लस्टर आधारित कृषि प्रणाली (सामूहिक खेती) आज के समय की बड़ी जरूरत है। अधिकारियों ने इसके वैज्ञानिक और व्यावहारिक लाभ गिनाते हुए बताया कि समूह में एक जैसी फसलें लेने से खाद, बीज और परिवहन की लागत आपस में बंट जाती है। आधुनिक कृषि यंत्रों और उन्नत तकनीकों का सामूहिक उपयोग बेहद आसान हो जाता है। बिचौलियों से मुक्ति मिलती है; बड़ी मंडियों और व्यापारियों से सीधे मोल-तोल करने की क्षमता बढ़ती है, जिससे सीधे तौर पर उत्पादन और मुनाफे में वृद्धि होती है।

विविधीकरण पर ज़ोर- सिर्फ धान नहीं, अब फल, सब्जी और पशुपालन भी

वनांचल के किसानों की आय के स्रोतों को बढ़ाने के लिए कृषि, उद्यानिकी और पशुपालन तीनों विभागों ने मिलकर एक मुकम्मल रोडमैप ग्रामीणों के सामने रखा।  स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और मिट्टी के मिजाज को देखते हुए किसानों को उन्नत फल और नकदी सब्जी उत्पादन के लिए प्रेरित किया गया, ताकि उन्हें हर मौसम में नियमित आय मिलती रहे। केवल खेती पर निर्भरता कम करने के लिए वैज्ञानिक पशुपालन, नियमित टीकाकरण, डेयरी विकास और बैकयार्ड मुर्गीपालन जैसी सहायक गतिविधियों की तकनीकी बारीकियां सिखाई गईं। शासन की कल्याणकारी योजनाओं, जैविक (ऑर्गेनिक) खेती के लाभ और जल संरक्षण के लिए बेहतर सिंचाई प्रबंधन के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की गईं।

घोटूल में गूंजीं उम्मीदें- संवेदनशीलता से सुनी गईं मांगें

इस संवाद कार्यक्रम की सबसे खूबसूरत तस्वीर तब सामने आई, जब घोटूल (पारंपरिक सामुदायिक केंद्र) में बैठकर किसानों ने बिना किसी संकोच के अपनी व्यावहारिक दिक्कतें अधिकारियों के सामने रखीं। अधिकारियों ने भी केवल भाषण देने के बजाय किसानों की समस्याओं को संवेदनशीलता से सुना और उन्हें निरंतर तकनीकी सहयोग का भरोसा दिलाया। इस संवाद के सकारात्मक परिणाम के रूप में, किसानों ने उन्नत बीजों, कृषि इनपुट्स की उपलब्धता और जल संचयन के लिए स्थानीय स्तर पर तालाबों के निर्माण की मांग रखी, जिसे अधिकारियों ने प्राथमिकता से पूरा करने की बात कही।

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

कच्चापाल का यह मैदानी संवाद इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि शासन की योजनाएं सीधे खेतों और चौपालों तक पहुंचें, तो ग्रामीण विकास की रफ्तार को कोई रोक नहीं सकता। पारंपरिक खेती को आधुनिकता, संगठन (क्लस्टर) और विविधीकरण से जोड़कर ओरछा के इस अबूझमाड़ क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि और आत्मनिर्भरता का एक नया स्वर्णिम अध्याय शुरू हो रहा है।

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