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CG Politics: रायपुर में अपना और भाजपा दोनों का सम्मान बचाएंगे बृजमोहन

By Om Prakash Verma
Published: March 6, 2024
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CG Politics: रायपुर में अपना और भाजपा दोनों का सम्मान बचाएंगे बृजमोहन
CG Politics: रायपुर में अपना और भाजपा दोनों का सम्मान बचाएंगे बृजमोहन
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कद्दावर नेता को मैदान में उतारकर भाजपा ने कांग्रेस को कर दिया चारों खाने चित्त
रायपुर (श्रीकंचनपथ न्यूज़)। भाजपा के वर्चस्व वाली रायपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस का प्रत्याशी आना अभी बाकी है, लेकिन इससे पहले ही कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई है। दरअसल, भाजपा ने इस सीट पर बृजमोहन अग्रवाल जैसे कद्दावर नेता को उतारकर आधी बाजी पहले ही जीत ली है। बची हुई आधी बाजी को जीतना बृजमोहन अग्रवाल जैसे सुलझे हुए और बेहद परिवक्व राजनेता के लिए मुश्किल नहीं है। 1996 से लेकर अब तक रायपुर सीट भाजपा का गढ़ है। इसलिए यह कहना कठिन नहीं होगा कि बतौर लोकसभा प्रत्याशी बृजमोहन अपने और भाजपा दोनों के सम्मान पर कोई आंच आने नहीं देंगे। फिलहाल मातृशोक से गुजर रहे बिरजू भैय्या को महज 6 माह के भीतर एक बार फिर चुनाव मैदान में उतारा गया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी, बृजमोहन ने ही रायपुर संसदीय सीट की कमान संभाली थी। तब इस लोकसभा क्षेत्र की 9 विधानसभा में से 6 पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया था। बावजूद इसके बृजमोहन ने भाजपा की जीत तय करने में अहम् भूमिका निभाई थी।

6 महीने पहले प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो बृजमोहन अग्रवाल को स्कूल व उच्च शिक्षा, धर्मस्व व पर्यटन और संसदीय कार्यमंत्री जैसे दायित्व सौंपे गए। लेकिन उनकी नेतृत्व क्षमता और अपराजेय छवि के चलते पार्टी ने उन्हें लोकसभा का प्रत्याशी बनाया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चुनाव जीतने के बाद बृजमोहन राज्य की राजनीति से कट जाएंगे। लेकिन यह भी हकीकत है कि दिल्ली में छत्तीसगढ़ को एक मजबूत नेता मिलेगा। वैसे भी प्रदेश की राजनीति में बृजमोहन का कद काफी बड़ा है। कहा जा रहा था कि राज्य में सरकार बनने के बाद बृजमोहन के साथ न्याय नहीं हो पाया और उन्हें अनुभव के हिसाब से अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए। हालांकि बृजमोहन ने कभी ऐसी बातों को तवज्जो नहीं दी। यही उनकी खासियत भी है। वे कमजोर समझे जाने वाले विभागों को भी अचानक महत्वपूर्ण बना देते हैं। 2005 में जब उन्हें संस्कृति और पर्यटन विभाग सौंपा गया था, तब तक इन विभागों को मृतप्राय माना जाता था, लेकिन बृजमोहन ने अचानक ही इन विभागों को पुनर्जीवित कर महत्वपूर्ण बना दिया था।

9 में से 8 सीटें भाजपा के पास
रायपुर संसदीय सीट को वीआईपी सीट माना जाता है, क्योंकि प्रदेश की सरकार यहीं बैठती है। प्रदेश के सारे निर्णय रायपुर से ही होते हैं। इस लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 9 विधानसभा क्षेत्रों में से एकमात्र आरंग सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए रिजर्व है। भाजपा के लिए अच्छी बात यह है कि इन 9 विधानसभा क्षेत्रों में से सिर्फ 1 भाटापारा सीट पर ही कांग्रेस का कब्जा है। यहां से कांग्रेस के इंद्रकुमार साव ने जीत हासिल की थी। जबकि बाकी की 8 सीटों में भाजपा के ही विधायक हैं। इनमें बलौदा बाजार से टंकराम वर्मा, धरसींवा से अनुज शर्मा, रायपुर (ग्रामीण) मोतीलाल साहू, रायपुर शहर (पश्चिम) से राजेश मूणत, रायपुर शहर (उत्तर) पुरंदर मिश्रा, रायपुर शहर (दक्षिण) बृजमोहन अग्रवाल, आरंग गुरू खुशवंत साहब, और अभनपुर से इंद्रकुमार साहू शामिल हैं। रायपुर लोकसभा क्षेत्र में करीब 25 लाख की आबादी रहती है, जिनमें साहू और कुर्मी समाज का वर्चस्व है। रायपुर में 30 फीसदी आबादी साहू समाज की तो 20 फीसदी आबादी कुर्मी समाज की है।

7 बार सांसद रहे रमेश बैस
रायपुर लोकसभा सीट की बात करें तो यहां पर कई दशकों से भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व रहा है। इसमें भी यहां पर रमेश बैस खुद 7 बार सांसद रह चुके हैं। रमेश बैस 1989 में रायपुर सीट से पहली बार सांसद बने। इसके बाद 1991 में हुए चुनाव में कांग्रेस के विद्याचरण शुक्ला को रायपुर सीट से सांसद बनने का मौका मिला। दोबारा जब 1996 में लोकसभा चुनाव हुए तो रमेश बैस ने एक बार फिर जीत हासिल की। इस चुनाव के बाद से रमेश बैस ने कभी पीछ मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 1996 के बाद 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 में लगातार रायपुर सीट पर जीत हासिल की। हालांकि 2019 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने रायपुर सीट पर सुनील सोनी को उम्मीदवार बना दिया। भाजपा को जीत दिलाने में सुनील सोनी भी पीछे नहीं रहे। हालांकि उनकी जीत के पीछे बृजमोहन अग्रवाल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस बार फिर प्रत्याशी बदलते हुए भाजपा ने सुनील सोनी के स्थान पर बृजमोहन अग्रवाल को मैदान में उतारा है।

ऐसा है बृजमोहन का राजनीतिक सफरनामा
भाजपा के वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल साल 1990 को महज 31 साल की उम्र में पहली बार विधायक बने थे। छात्र जीवन से ही इन्होंने राजनीति की शुरुआत कर दी थी। 1984 में वे भारतीय जनता पार्टी के सदस्य बने। 1988 से 1990 तक वे भाजयुमो के युवा मंत्री रहे। 1990 में वे पहली बार मध्यप्रदेश विधानसभा में विधायक बने। इसके बाद से 1993, 1998, 2003, 2008, 2013, 2018 और 2023 में वे लगातार विधायक निर्वाचित होते आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। इन्हें छत्तीसगढ़ में राजनीति का चाणक्य भी कहा जाता हैं। 2005 में उन्हें राजस्व, संस्कृति एवं पर्यटन, कानून और पुनर्वास का प्रभार सौंपा गया। इसी तरह 2006 में वन, खेल और युवा मामलों का प्रभार दिया गया। 2008 में स्कूल शिक्षा, लोक निर्माण, संसदीय मामले, पर्यटन और बंदोबस्त ट्रस्ट संस्कृति विभाग संभाला। 2013 में कृषि और जैव प्रौद्योगिकी, पशुपालन, मछलीपालन, जल संसाधन, सिंचाई, आयाकट, धार्मिक और बंदोबस्त विभागों का दायित्व मिला। वहीं, 2023 में स्कूल व उच्च शिक्षा, धर्मस्व और पर्यटन, संसदीय कार्यमंत्री का दायित्व निभा रहे हैं।

ऐसे रहे पिछले दो चुनाव के नतीजे
2014 के चुनाव में भाजपा ने जहां रमेश बैस को रायपुर संसदीय क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया था तो वहीं कांग्रेस की तरफ से सत्यनारायण शर्मा ने चुनाव लड़ा। चुनाव में बैस ने करीब 6,33,836 मत हासिल किए। वहीं 4,71,803 वोट हासिल कर कांग्रेस प्रत्याशी सत्यनारायण शर्मा दूसरे स्थान पर रहे। वहीं 2019 लोकसभा चुनाव की बात करें तो इस बार भी भाजपा का वर्चस्व देखने को मिला। भारतीय जनता पार्टी के सामने कांग्रेस के उम्मीदवार ने अपनी प्रबल दावेदारी पेश की। हालांकि भाजपा ने 2019 में रमेश बैस को टिकट न देकर सुनील सोनी को उम्मीदवार बनाया, वहीं कांग्रेस ने भी सत्यनारायण शर्मा की जगह प्रमोद दुबे को अपना उम्मीदवार बनाया। चुनाव परिणाम में भाजपा प्रत्याशी सुनील सोनी को 8,37,902 वोट प्राप्त हुए, वहीं दूसर स्थान पर रहे कांग्रेस के प्रत्याशी प्रमोद दुबे को 4,89,664 वोट प्राप्त हुए।

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