नई दिल्ली (एजेंसी)। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड समेत 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जब चिंतन शिविर का ऐलान किया था तो कुछ उम्मीदें जगी थीं कि अब पार्टी बदलाव की ओर बढ़ेगी। उदयपुर में 3 दिन के चिंतन शिविर को लेकर कांग्रेसी भी बहुत उम्मीद से भरे थे। सोनिया गांधी ने उद्घाटन भाषण में जब कहा कि आप यहां कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र हैं तो माना गया कि मंथन में खुलकर चर्चा होगी। लेकिन तीन दिनों के शिविर के समापन में जो सामने आया, वह था अल्पसंख्यकों, दलितों एवं ओबीसी वर्गों के लिए कोटा और 2 अक्टूबर से यात्रा का ऐलान। लेकिन सबसे अहम बात जिस नेतृत्व को लेकर अकसर जी-23 के नेता भी सवाल उठाते रहे हैं, उस पर कोई बात नहीं की गई।

तीन अहम सवालों के नहीं मिले कोई जवाब
कांग्रेस के संगठन में कमजोर वर्गों के नेताओं को कोटा देने पर बात हुई, सत्ता में आने पर किसानों के लिए एमएसपी गारंटी का भी प्रस्ताव आया और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से जमीन पर उतरने का भी आह्वान किया गया। लेकिन तीन अहम सवालों की चिंता इस चिंतन शिविर में नहीं की गई। ये सवाल थे- चुनाव कैसे जीतेंगे, अगले कुछ साल कांग्रेस को कौन लीड करेगा और कैसे भाजपा के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का मुकाबला कांग्रेस करेगी? दरअसल कांग्रेस के सामने जो चुनौतियां हैं, वे इन तीनों का ही मिला-जुला रूप हैं। ऐसे में इन सवालों का हल तलाशे बिना कांग्रेस का उदयपुर के चिंतन शिविर से उदय होना मुश्किल लगता है।
बातें बड़ी, सुझावों पर से बनाई दूरी
कांग्रेस के पूरे चिंतन शिविर में भारी-भरकम शब्दों में बात की गई। विचारधारा की लड़ाई पर बात हुई और जनता से कट जाने की बात को भी स्वीकार किया गया। खुद राहुल गांधी ने कहा कि हमें पद से ज्यादा चर्चा अपने काम की करनी होगी। लेकिन यह काम कौन करेगा और किसे क्या जिम्मा होना चाहिए, इस पर कोई बात नहीं हुई। एक तरफ कांग्रेस लीडरशिप यह दावा करती दिखी कि उसने असंतुष्टों की भी सुनवाई की है, लेकिन उनके सुझावों पर अहम नहीं होता दिखा। जी-23 की मांग थी कि कांग्रेस संसदीय बोर्ड का गठन किया जाए, इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया।
कांग्रेस वर्किंग कमेटी में नहीं हैं कई चर्चित चेहरे
इसके अलावा कांग्रेस वर्किंग कमेटी में जिन सदस्यों को जगह मिली है, उनमें कई चर्चित नेता शामिल नहीं हैं। खासतौर पर सचिन पायलट, कमलनाथ, डीके शिवकुमार, भूपेंदर सिंह हुड्डा, भूपेश बघेल, अशोक गहलोत और पृथ्वीराज चव्हाण इनमें शामिल हैं। इन सभी नेताओं की अपने-अपने राज्यों में जमीन पर पकड़ मानी जाती है। लेकिन इनकी बजाय पैराशूट नेताओं को वर्किंग कमेटी में जगह मिली हुई है। ऐसे में वर्किंग कमेटी के ऊपर माने जाने वाले संसदीय बोर्ड के गठन की मांग गलत नहीं थी, लेकिन उस पर आगे न बढ़ते हुए लीडरशिप ने वर्किंग कमेटी की लीडरशिप में ही एक पैनल के गठन का फैसला लिया है।




