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अबूझमाड़ का नया सवेरा: डोंडरीबेड़ा से कटेर की सड़क ने मिटाया दशकों का सन्नाटा

By Poonam Patel Published July 11, 2026
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विकास की राह पर दौड़ी जिंदगी
विकास की राह पर दौड़ी जिंदगी
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रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर (Bastar) अंचल में हुए एक विशिष्ट सड़क  विकास से दशकों तक कटा रहा। दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों (जैसे डोंडरबेड़ा और कटेर) को मुख्य मार्गों से जोड़कर आवागमन की बाधाओं, पलायन और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के अंधकार को मिटा रही है।

ये पक्की सड़कें न केवल दशकों का सन्नाटा तोड़ती हैं, बल्कि सुदूर इलाकों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, और बाज़ार तक पहुंच जैसे मौलिक लाभ भी पहुंचाती हैं।

गहरे जंगलों से घिरा अबूझमाड़… एक ऐसा अंचल, जिसका नाम सुनते ही कभी जेहन में दुर्गम रास्ते, कटी हुई जिंदगी और विकास की अंतहीन प्रतीक्षा की तस्वीर उभरती थी। लेकिन आज इस अबूझमाड़ की फिजा बदल रही है। प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) के तहत नारायणपुर जिले के अतिदुर्गम इलाके में बनी एक नई सड़क ने यहाँ के ग्रामीणों के जीवन में खुशियों का एक नया अध्याय लिख दिया है।

डोंडरीबेड़ा कैंप से कटेर तक बनी 8.75 किलोमीटर लंबी यह सड़क सिर्फ डामर की पट्टी नहीं है, बल्कि दशकों से मुख्यधारा से कटे जनजातीय गांवों के लिए उम्मीद और भरोसे की एक मजबूत डोर है।

​पगडंडियों का दर्द और बारिश का वो खौफ

​कुछ समय पहले तक, इस इलाके के गांवों तक पहुँचने का एकमात्र जरिया संकरी और पथरीली पगडंडियां थीं। मानसून के आते ही ये रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते थे, जिससे ग्रामीण अपने ही घरों में कैद होने को मजबूर थे। बच्चों को स्कूल जाने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता था। एम्बुलेंस का गाँवों तक आना नामुमकिन था। कई बार आपातकालीन परिस्थितियों में समय पर अस्पताल न पहुँच पाने के कारण गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती थी। ग्रामीण अपनी कड़ी मेहनत से उगाई गई कृषि और वनोपज को हाट-बाजारों तक नहीं ले जा पाते थे, जिससे उन्हें उनके हक़ की सही कीमत नहीं मिलती थी।

​856.19 लाख रुपए की लागत से बदला भूगोल

प्रशासन की दृढ़ इच्छाशक्ति और ‘पीएम-जनमन’ योजना की ताकत से 856.19 लाख रुपये की भारी लागत के साथ इस दुर्गम चुनौती को पार किया गया। डोंडरीबेड़ा कैंप से कटेर तक की इस चमचमाती सड़क ने अब इन गांवों की किस्मत बदल दी है। ​पहली बार गाँव की चौखट तक पहुँची एम्बुलेंस और विकास।​सड़क बनने से पूरे अंचल की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर में जादुई बदलाव आया है।

सुगम यातायात से शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं का हुआ विस्तार

​अब 108 एम्बुलेंस, शासकीय वाहन और प्रशासनिक टीमें सीधे ग्रामीणों के घर तक पहुँच रही हैं। रास्तों की सुगमता से अब शिक्षक और विद्यार्थी दोनों नियमित रूप से स्कूल पहुँच रहे हैं, जिससे शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ है। स्थानीय किसान अब अपनी उपज को सीधे और आसानी से बड़े बाजारों तक पहुँचा पा रहे हैं। बिचौलियों का खेल खत्म हो रहा है और ग्रामीणों की जेब में सीधे पैसा आ रहा है।

​पक्के मकानों का सपना हुआ सच

सड़क बनते ही प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान बनाने के लिए सीमेंट, छड़ और रेत जैसी निर्माण सामग्रियां बिना किसी बाधा के गाँवों तक पहुँचने लगी हैं। इसके साथ ही बिजली और पेयजल योजनाओं के काम ने भी रफ्तार पकड़ ली है।

गाँव के बुजुर्गों और युवाओं के चेहरे पर अब एक अलग ही चमक है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहाँ नारायणपुर या नजदीकी बाजार जाने के लिए हमें घंटों पैदल चलना पड़ता था और पूरा दिन बर्बाद हो जाता था, वहीं अब गाड़ियां सीधे हमारे घरों के सामने आकर रुकती हैं। बच्चों की पढ़ाई और इलाज की चिंता अब पूरी तरह खत्म हो गई है। ऐसा लगता है जैसे हमें एक नई जिंदगी मिल गई है।

​मुख्यधारा से जुड़ता अबूझमाड़

​पीएम-जनमन योजना के माध्यम से निर्मित यह सड़क इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि संपर्क (Connectivity) मजबूत हो, तो देश का सबसे दूरस्थ और पिछड़ा क्षेत्र भी सामाजिक और आर्थिक विकास की नई ऊंचाइयों को छू सकता है। डोंडरीबेड़ा से कटेर तक का यह सफर, अबूझमाड़ के आदिवासियों के आत्मनिर्भर और सशक्त बनने का एक ऐतिहासिक गवाह बन चुका है।

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Poonam Patel July 11, 2026
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