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रामगढ़ महोत्सव: जहां इतिहास, आस्था और संस्कृति का हजारों वर्षों पुराना वैभव होता है सजीव

By Mohan Rao Published June 26, 2026
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सरगुजा। छत्तीसगढ़ का सरगुजा अंचल प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ अपनी समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पौराणिक विरासत के लिए भी विशेष पहचान रखता है। इसी विरासत का सबसे अनमोल अध्याय है सरगुजा जिले में उदयपुर विकासखंड स्थित रामगढ़, जहां हर वर्ष आयोजित होने वाला ’’रामगढ़ महोत्सव’’ प्रदेश की गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत स्वरूप प्रदान करता है। यह महोत्सव केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के इतिहास, कला, पुरातत्व और आस्था से जुड़ने का अद्भुत अवसर है।

रामगढ़ पर्वत की पश्चिमी ढलान पर स्थित ’’सीताबेंगरा’’ और ’’जोगीमारा’’ गुफाएं भारतीय इतिहास की अनुपम धरोहर हैं। इन गुफाओं का उल्लेख देश के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में किया जाता है। यहां की शिल्पकला, स्थापत्य, शिलालेख और प्राचीन चित्र भारतीय सभ्यता के उत्कर्ष की कहानी कहते हैं। यही कारण है कि यह स्थल वर्षों से इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

रामगढ़ क्षेत्र का संबंध रामायणकालीन परंपराओं से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने वनवास के दौरान यहां कुछ समय व्यतीत किया था। माना जाता है कि जिस गुफा में माता सीता ने निवास किया, वही आज सीताबेंगरा के नाम से प्रसिद्ध है। इस धार्मिक आस्था के कारण रामगढ़ केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि श्रद्धा का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। सीताबेंगरा गुफा को भारतीय रंगमंच के इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है। इसकी अनूठी संरचना, बैठने की व्यवस्था और मंच जैसी आकृति के कारण अनेक विद्वान इसे विश्व की सबसे प्राचीन अथवा भारत की प्राचीनतम नाट्यशालाओं में से एक मानते हैं। लगभग 45 फीट गहरी इस गुफा में निर्मित प्राकृतिक रंगमंच आज भी प्राचीन भारतीय कला और सांस्कृतिक परंपरा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

सीताबेंगरा के समीप स्थित जोगीमारा गुफा भारतीय चित्रकला की आरंभिक परंपरा की अमूल्य धरोहर मानी जाती है। यहां तीसरी-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के भित्तिचित्रों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनमें मानव आकृतियां, नृत्य, संगीत, पशु-पक्षी और सामाजिक जीवन के दृश्य अंकित थे। लाल, पीले और काले रंगों से निर्मित ये चित्र भारतीय कला के विकासक्रम की महत्वपूर्ण कड़ी माने जाते हैं। रामगढ़ की एक और विशेष पहचान ’’हाथीपोल’’ है। लगभग 180 फीट लंबी प्राकृतिक सुरंग अपनी अनोखी संरचना के कारण पर्यटकों को रोमांचित करती है। माना जाता है कि वर्षों तक जल प्रवाह के कारण इसका वर्तमान स्वरूप बना। सुरंग के दूसरे छोर पर स्थित सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफाएं इस पूरे क्षेत्र को और अधिक आकर्षक बनाती हैं।

रामगढ़ क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों के अवशेष भी आज इतिहास की अमिट गवाही देते हैं। भगवान विष्णु, श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान और देवी की प्राचीन प्रतिमाएं, नक्काशीदार स्तंभ, मंदिरों के द्वार और स्थापत्य कला तत्कालीन शिल्पकारों की अद्भुत प्रतिभा को दर्शाते हैं। इतिहासकारों के अनुसार यह क्षेत्र प्रारंभिक कलचुरी शासनकाल के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्रों में शामिल रहा है। आज रामगढ़ इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन चुका है। देश-विदेश से आने वाले शोधकर्ता, विद्यार्थी और पर्यटक यहां की धरोहरों का अध्ययन करने पहुंचते हैं। राज्य सरकार द्वारा आयोजित ’’रामगढ़ महोत्सव’’ इस ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने के साथ-साथ प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

रामगढ़ केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सरगुजा की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक चेतना, कला, आस्था और गौरवशाली इतिहास का जीवंत प्रतीक है। सीताबेंगरा की पौराणिक मान्यताएं, जोगीमारा की प्राचीन चित्रकला, हाथीपोल की अद्भुत प्राकृतिक संरचना और यहां बिखरे पुरातात्विक अवशेष मिलकर यह संदेश देते हैं कि सरगुजा का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही समृद्ध और प्रेरणादायी भी। यही कारण है कि रामगढ़ महोत्सव आज इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और विश्व पटल पर स्थापित करने का प्रभावी माध्यम बन चुका है।

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