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ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े कदम

By Poonam Patel
Published: June 13, 2026
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ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े कदम
ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े कदम
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रायपुर। ग्रीष्मकालीन उड़द एवं मूंग की खेती किसानों के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल रही है। कृषि विभाग के मार्गदर्शन, उन्नत बीजों की उपलब्धता तथा वैज्ञानिक खेती की तकनीकों के कारण बेमेतरा जिले में इस वर्ष ग्रीष्मकालीन दलहन खेती का रकबा उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। जहां पिछले वर्ष केवल 285 हेक्टेयर क्षेत्र में उड़द-मूंग की खेती की गई थी, वहीं इस वर्ष यह बढ़कर 1191 हेक्टेयर तक पहुंच गई है। इसमें लगभग 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में 1280 किसानों द्वारा ग्रीष्मकालीन उड़द का प्रदर्शन किया गया, जिससे किसानों को नई तकनीकों को सीखने और अपनाने का अवसर मिला।

इस सकारात्मक परिवर्तन की कहानी ग्राम गाड़ाभाठा के कृषक अमर सिंह साहू तथा ग्राम बिजागोंड के कृषक चंद्रकुमार कुंभकार जैसे प्रगतिशील किसानों से जुड़ी हुई है, जिन्होंने पहली बार ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती कर उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त किए हैं।

उन्नत तकनीक से बढ़ा किसानों का विश्वास

बेमेतरा के विकासखंड साजा के ग्राम गाड़ाभाठा निवासी कृषक अमर सिंह साहू ने कृषि विभाग के मार्गदर्शन में लगभग 1.5 एकड़ भूमि में ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती की। उन्हें विभाग द्वारा उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराए गए तथा कतार पद्धति से बुवाई, समय पर सिंचाई और समुचित पोषण प्रबंधन की जानकारी दी गई। 21 अप्रैल 2026 को की गई बुवाई के बाद फसल की बढ़वार अत्यंत संतोषजनक रही। वर्तमान में उनकी फसल अच्छी स्थिति में है तथा लगभग 7 से 8 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन प्राप्त होने की संभावना है।

अमर सिंह साहू बताते हैं कि पहले वे केवल परंपरागत फसलों पर निर्भर रहते थे, लेकिन कृषि विभाग की सलाह और प्रदर्शन कार्यक्रम को देखकर उन्होंने ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती अपनाई। फसल की वर्तमान स्थिति देखकर उन्हें बेहतर आय की उम्मीद है और भविष्य में वे अधिक क्षेत्र में दलहन फसलों का उत्पादन करने की योजना बना रहे हैं।

प्रदर्शन प्लॉट से मिली नई दिशा

इसी प्रकार ग्राम बिजागोंड के कृषक चंद्रकुमार कुंभकार ने भी उड़द का प्रदर्शन लगाया। उन्होंने 12 अप्रैल 2026 को कतार पद्धति से बुवाई की। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने और कृषि विभाग के नियमित तकनीकी मार्गदर्शन का लाभ उन्हें मिला। उनकी फसल वर्तमान में स्वस्थ एवं घनी अवस्था में है तथा 8 से 9 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन मिलने का अनुमान है। चंद्रकुमार का कहना है कि ग्रीष्मकालीन मौसम में उड़द की खेती को लेकर प्रारंभ में कुछ संदेह था, लेकिन विभागीय अधिकारियों के सहयोग और सफल प्रदर्शन को देखकर उनका आत्मविश्वास बढ़ा। अब वे अपने गांव के अन्य किसानों को भी दलहन फसलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

आय में वृद्धि के साथ मृदा स्वास्थ्य में सुधार

ग्रीष्मकालीन उड़द की खेती केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और मृदा स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी सिद्ध हो रही है। दलहन फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं। इससे आगामी फसलों के लिए भूमि अधिक उपजाऊ बनती है तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। यदि समय पर वर्षा हो जाए तो इन फसलों का उपयोग हरी खाद के रूप में भी किया जा सकता है, जिससे भूमि की गुणवत्ता और बेहतर होती है।

किसानों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण

अमर सिंह साहू और चंद्रकुमार कुंभकार की सफलता यह साबित करती है कि यदि किसानों को समय पर गुणवत्तायुक्त बीज, वैज्ञानिक तकनीक और सही मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए तो वे नई फसलों को अपनाकर बेहतर उत्पादन और आय अर्जित कर सकते हैं। इन दोनों किसानों ने यह दिखाया है कि ग्रीष्मकालीन मौसम में भी दलहन फसलों की सफल खेती संभव है और यह खेती किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

बेमेतरा जिले में ग्रीष्मकालीन उड़द की बढ़ती खेती आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में एक सशक्त कदम है। यह पहल किसानों की आय बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य सुधारने तथा टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। अमर सिंह साहू और चंद्रकुमार कुंभकार जैसे किसानों की सफलता अन्य कृषकों के लिए प्रेरणा बन रही है और जिले में दलहन उत्पादन के नए आयाम स्थापित कर रही है।

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