प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह सहित 20 राज्यों के मुख्यमंत्री बने शपथ समारोह के गवाह
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी ने भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। शुभेंदु ने बांग्ला में ईश्वर के नाम की शपथ ली। शपथ के बाद सुवेंदु पीएम मोदी के पास गए और उनके पैर छुए। शुभेंदु अधिकारी के साथ दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तिनिया, खुदीराम टुडू व निशिथ घोष ने भी शपथ ली। यानी यह सभी विधायक भी मंत्री बनेंगे।

बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद शनिवार को कोलकाता के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड में शपथ ग्रहण समारोह को आयोजन किया गया। सुबह 11 बजे सबसे पहले शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शुभेंदू ने भबानीपुर से सीएम ममता बेनर्जी को 15 हजार से ज्यादा मतों से हराया। शुभेंदू ने अपनी पारंपरिक सीट नंदीग्राम से भी टीएमसी प्रत्याशी को हराया। शुभेंदु के बाद पांच विधायकों ने भी शपथ ली। इस दौरान पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, एनडीए और भाजपा शासित राज्यों के 20 मुख्यमंत्री मौजूद रहे।

रवींद्रनाथ टैगोर को दी श्रद्धाजंलि
कार्यक्रम में सबसे पहले मोदी ने मंच पर रवींद्रनाथ टैगोर को उनकी जयंती पर श्रद्धाजंलि दी। इसके बाद पीएम ने मंच पर भाजपा के 98 साल के कार्यकर्ता माखनलाल सरकार का सम्मान किया। मंच पर आते ही प्रधानमंत्री सीधे सरकार के पास गए, उन्हें शॉल ओढ़ाया और फिर उनके पैर छुए। इसके बाद सरकार ने देर तक प्रधानमंत्री को गले लगाए रखा। यही नहीं परेड ग्राउंड पहुंचने से पहले पीएम मोदी ने रोड शो भी किया।
पीएम मोदी ने भाजपा के सबसे पुराने कार्यकर्ता का किया अभिवादन
प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल में भाजपा के वरिष्ठतम कार्यकर्ताओं में से एक माखनलाल सरकार का अभिनंदन किया और उनसे आशीर्वाद लिया। 1952 में, भारतीय तिरंगा फहराने के आंदोलन के दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कश्मीर में मौजूद माखनलाल सरकार को गिरफ्तार कर लिया गया था। 98 वर्ष की आयु में भी श्री माखनलाल सरकार स्वतंत्रताोत्तर भारत में राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़े शुरुआती जमीनी स्तर के नेताओं में से एक हैं।
शुभेंदू का संक्षिप्त परिचय
1970 में पूर्व मेदिनीपुर के कोंतली गांव में जन्मे सुवेंदु का बचपन से ही आस्था की ओर झुकाव है। हर शनिवार रामकृष्ण मिशन जाना उनका तय रूटीन था। वे बचपन में इतने धार्मिक थे कि घरवालों को डर लगने लगा था कहीं बेटा संन्यासी न बन जाए। घर में जमा सिक्के भी चुपचाप मिशन में दान कर आते थे। परिवार को लगता था, कभी भी घर छोड़ सकते हैं। लेकिन सुवेंदु ने दूसरा फैसला लिया… संन्यास नहीं, राजनीति करेंगे और शादी भी नहीं करेंगे। 80 के दशक के अंत में कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज से सुवेंदु की छात्र राजनीति शुरू हुई। धीरे-धीरे पूर्व मेदिनीपुर में अपनी अलग पहचान बना ली।




