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Gustakhi Maaf: चींटियों ने बिगाड़ा स्वच्छता का खेल

By Om Prakash Verma
Published: May 27, 2024
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
शहरों को स्वच्छता रैंकिंग में बेहतर रैंकिंग दिलाने की कोशिशें पिछले कई सालों से की जा रही हैं। कचरे की सबसे बड़ी समस्या उसमें शामिल पालीथीन और प्लास्टिक पैकिंग मटेरियल हैं। इससे भी बड़ी समस्या इलेक्ट्रानिक वेस्ट की है। एक और समस्या है, भगवान को चढ़ाया गया फूल। इन फूलों को कचरे में नहीं डाला जा सकता। जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे हैं, यह समस्या पहले से भी कहीं बड़ी और विकराल होती जा रही है। स्थानीय सरकारों ने शहरों को स्वच्छ रखने के लिए लोगों को अलग-अलग रंगों के डस्टबिन तक बांटे पर कचरा है कि वह सड़कों के किनारे, नालियों में और मुक्कड़ों पर ही फैला-पसरा नजर आता है। सबसे ज्यादा कचरा तो नालियों से निकलता है। जहां-जहां नालियां सीमेंट-कंक्रीट की हैं वहां से तो अजब-गजब चीजें निकल आती हैं। काले कीचड़ में सने बच्चों के खिलौने, टूटी हुई चप्पलें, बैटरियां, इलेक्ट्रानिक कचरा जब बाहर निकालकर रखा जाता है तो वह काले सोने जैसा प्रतीत होता है। वैसे स्थानीय सरकार ने जो डस्टबिन बाटें हैं उसका मुख्य उद्देश्य गीले कचरे को अलग करना है। गीले कचरे को आसानी से खपाया जा सकता है। इसका खाद बन सकता है, इसे निथारकर निकाला गया ‘चिकटÓ भी पौधों के लिए खाद का काम करता है। सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग करने के लिए इस बार शासन सख्त है। आदेश है कि अलग-अलग डस्टबिनों का सही इस्तेमाल किया जाए अन्यथा दंड का भागीदार बनना पड़ सकता है। बावजूद इसके कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। दिन भर पर्यावरण पर भाषण देने वाले भी अपने घरों में इसे लागू करने में असमर्थ रहे हैं। वजह एक ही है – चींटी। गीला कचरा जिस डिब्बे में रखा होता है, उसमें चीटिंयां लग जाती हैं। खासकर मीठे फलों के छिलकों का क्या करें, यह एक बड़ी मुसीबत साबित होती है। फिलहाल आमों, तरबूज और खरबूजे का मौसम चल रहा है। इसके छिलकों को घर के किसी भी कोने में संभाल कर नहीं रखा जा सकता। कचरा वाला, जहां आता भी है, तो दूसरे दिन सुबह ही आता है जबकि लोग फलों का सेवन दिन भर करते हैं। जब तक कचरा वाला आता है, इस कचरे में चींटियां लग जाती हैं। लिहाजा इन्हें अपने बाउण्ड्री से बाहर करना ही बेहतर लगता है। लोग स्कूटी में इस कचरे का पैकेट लेकर घर से निकलते हैं और जहां-तहां उछाल देते हैं। कारों के शीशे उतारकर कचरे से भरा पालीथीन फेंकने वालों की भी कोई कमी नहीं है। ऐसा नहीं है कि गीले कचरे को चींटियों से बचाने की कोई तरकीब उनके पास नहीं है पर इतनी मुसीबत क्यों उठाएं। आखिर इस कचरे से गंध भी तो उठती है। लोगों को तो सिर्फ अपना घर साफ चाहिए। मोहल्ले की चिंता करने के लिए सरकार है न। इसलिए अपने घर का गीला कचरा पालीथीन या कचरा बैग में डालकर बाहर उछाल देने को वह अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है।

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