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Gustakhi Maaf: रेत निकासी से महानदी को कैसा खतरा

By Om Prakash Verma Published February 4, 2024
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
रेत खदानों की खबरों का मौसम आ गया है. गर्मियों में निर्माण-कार्य गति पकड़ते हैं. बारिश से पहले रेत निकालकर डंप कर लिया तो गर्मियों के शुरू होते ही रेत तुरत-फुरत बिकने लगती है. अच्छी कीमत भी मिल जाती है. पर खबरें इस बात पर कभी फोकस नहीं करतीं. खबर है कि चेन-माउंटेड (खबरों में इसे चेन-माउंटेन कहा गया है) मशीनों से महानदी से प्रतिदिन हजारों ट्रक रेत की चोरी हो रही है. इससे महानदी को खतरा उत्पन्न हो गया है. खनन ठेकेदारों ने महानदी के अंदर मुरुम की सड़कें बना ली हैं जिससे हाईवा जैसी गाड़ियां भी महानदी के बीच उतर रही हैं और रेत लेकर बाहर आ रही हैं. सवाल यह उठता है कि रेत को अवैध तरीके से निकाले जाने से नुकसान किसका है. पहला और सबसे बड़ा नुकसान खुद सरकार का है. 2019 में सरकार ने रेत खदानों से 200 करोड़ के राजस्व का लक्ष्य बनाया था. टेंडर फार्म बेचकर ही सरकार ने 4 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की थी. अब आते हैं इसके दूसरे पक्ष पर. वह है रेत की अवैध निकासी और ढुलाई का मामला. रेत को कोई जेब या जुर्राबों में भरकर नहीं ले जाता. बड़ी-बड़ी मशीनों से रेत का उत्खनन किया जाता है जिसका परिवहन हाईवा और ट्रक जैसे बड़े वाहनों से होता है. जाहिर है कि यह कोई छिप कर किया जाने वाला काम नहीं है. इस दो नम्बर के काम में राजनीतिक दलों की हिस्सेदारी होती है. इसी से पार्टी के लिए फंड और चुनावों के लिए ऊपरी पैसा आता है. इसी पैसे से सत्ताधारी और विपक्षी दलों के लोगों की नेतागिरी चलती है. तीसरा सवाल है स्वयं नदी का. क्या रेत निकासी से नदियों को कोई खतरा है? लगता तो नहीं है. पत्थर के टुकड़े नदियों में लुढ़ककर कंकड़ और फिर रेत में तब्दील हो जाते हैं. नदियों में पानी रोकने के लिए बनी संरचनाएं इस रेत और गाद को बह जाने से रोकती हैं. इससे नदियां उथली हो जाती हैं और उनकी जलधारण की क्षमता कम होती चली जाती है. गाद या रेत निकालने से नदियां गहरी होती हैं और उनकी जलधारण क्षमता बढ़ती है. फिर रेत की निकासी से नदियां कैसे खतरे में आ सकती हैं? बारिश का ज्यादा से ज्यादा पानी नदियों में रुके, यह तो सभी के लिए अच्छा है. बड़े बांधों में गाद निकालने के लिए ड्रेजिंग की जाती है जिससे उनकी जलधारण क्षमता बनी रहती है. दरअसल, लोगों के पेट में दर्द इस बात को लेकर है कि रेत खदानों से ठेकेदार और ट्रांसपोर्टर भारी-भरकम कमाई कर रहे हैं. पर उन्हें समझना होगा कि इसके लिए सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं. राजस्व के चक्कर में सरकार ने इतने फच्चर लगा रखे हैं कि मुफ्त मिलने वाली चीजें भी लगातार महंगी होती चली गईं. कभी नमक के लिए डांडी मार्च करने वाले देश में आज पानी पर भी टैक्स लगता है.

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Om Prakash Verma February 4, 2024
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