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Gustakhi Maaf: कुंभ कहें या पुन्नी मेला, इन बातों का रखें ध्यान

By Om Prakash Verma
Published: January 3, 2024
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
छत्तीसगढ़ के राजिम में तीन नदियों – महानदी, पैरी और सोंढूर का संगम है. इस स्थान पर सैकड़ों वर्षों से माघी पुन्नी (पूर्णिमा) मेला मनाया जाता रहा है. 1909 के गजेटियर में भी इसका उल्लेख मिलता है. 2001 में राज्य गठन के बाद इसे राजीव लोचन महोत्सव का नाम दिया गया. 2005 में तत्कालीन सरकार ने इसका नाम राजिम कुंभ रख दिया. 2019 में इसका नाम एक बार फिर माघी पुन्नी मेला रख दिया गया. अब 2024 में इस आयोजन को फिर से राजिम कुंभ का नाम दिया जा रहा है. नामकरण को मुद्दा न बनाएं तो एक बात स्पष्ट है कि सभी सरकारों ने राजिम में लगने वाले माघ मेले को धार्मिक पर्यटन का रूप देने की कोशिश की. किसी भी तरह के पर्यटन का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर होता है. मूल रूप से देश के चार स्थानों पर कुंभ का आयोजन किया जाता रहा है. पौराणिक कथाएं तथा ज्योतिषीय गणनाएं इसका आधार हैं. पुराणों के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप से दुर्बल हुए इंद्र और देवताओं पर असुरों ने आक्रमण कर दिया था. तब भगवान विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करके अमृत निकालने को कहा. अमृत कलश निकला तो इंद्र का पुत्र जयंत उसे लेकर उड़ गया. असुरों ने जयंत का पीछा कर उसे पकड़ लिया और घमासान मच गया. इस दौरान अमृत की कुछ बूंदे छलक गईं. पहली बूंद प्रयाग में, दूसरी हरिद्वार में, तीसरी उज्जैन और चौथी बूंद नासिक में गिरी. इसीलिए इन चार स्थानों को पवित्र माना जाता है और कुंभ मेले का आयोजन इन्हीं स्थान पर किया जाता है. अमृत कलश के लिए युद्ध 12 दिनों तक चला था. यह 12 दिन पृथ्वी पर 12 साल के बराबर होते हैं. ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार जब बृहस्पति वृष राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य मकर राशि में होते हैं तब कुंभ का आयोजन प्रयाग में होता है. सूर्य मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं तो यह आयोजन हरिद्वार में होता है. सूर्य और बृहस्पति जब सिंह राशि में प्रवेश करते हैं तब महाकुंभ मेला नासिक में होता है. इसी तरह जब बृहस्पति सिंह राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं तब कुंभ का आयोजन उज्जैन में किया जाता है. जबकि राजिम कुंभ हर साल लगाया जाता है. यही कारण है कि कुछ साधु-संतों और अखाड़ों ने राजिम कुंभ के नाम पर आपत्ति जताई थी. नामकरण को एक तरफ रखकर गौर करें तो कुंभ मेलों का आयोजन हमें कुछ महत्वपूर्ण संदेश भी देते हैं. ब्रह्म पुराण के अनुसार कुंभ के दौरान 14 प्रकार के कार्यों को अपवित्र बताया गया है. इनमें साबुन लगाकर नदी में स्नान करना, नदी में कपड़े-बर्तन धोना, कूड़ा-कचरा फेंकना, मल-मूत्र त्यागना, शवों को बहाना, आदि वर्जित है. इनका पालन कर हम अपनी नदियों और जलीय जीवों के जीवन की रखा कर सकते हैं.

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