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Gustakhi Maaf: क्या खाकर ऐसी बातें करते हैं नेता

By Om Prakash Verma Published July 28, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
सुकमा के एक बालिका छात्रावास में पांच साल की बच्ची से अनाचार किया गया। यह एक जघन्य अपराध है। जिन लोगों पर इन बच्चियों की देखरेख और सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, उनके खिलाफ भी तत्काल सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यह जिम्मेदारी छात्रावास अधीक्षिका से लेकर महिला एवं बाल विकास के अधिकारियों तक की बनती है कि वे यहां रहने वाली बच्चियों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करें। जनप्रतिनिधि और समाज प्रमुख भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। आखिर यह कैसे संभव हो जाता है कि बालिका छात्रावास में रात-बेरात पुरुष घुस आते हैं? इस घटना पर पुलिस ने तत्परता का परिचय दिया। इलाके के मोबाइल फोन के टावर डंप डाटा के आधार पर उसने 50 लोगों को हिरासत में लिया और उनकी शिनाख्ती परेड करवाई। बच्ची ने आरोपी को पहचान लिया। उसे गिरफ्तार किया जा चुका है। पर इससे उन लोगों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती जिनपर ऐसी घटनाओं को न होने देने की जिम्मेदारी है। पर अब इस मामले में छिछोरी राजनीति का प्रवेश हो गया है। भाजपा की महिला विधायकों, पूर्व मंत्री की टीम छात्रावास पहुंचती है। बच्चियों से बातचीत करती है और राजधानी रायपुर लौटकर प्रेस कांफ्रेंस करती हैं। वे कहती हैं कि बच्ची की हालत देखकर लगता है कि उसके साथ गैंग रेप हुआ है। ऐसे लोगों को विधानसभा नहीं बल्कि पुलिस में होना चाहिए। वे एक ही समय पर पुलिस अधिकारी, डाक्टर और जज की भूमिका निभा सकती हैं। चटपट निरीक्षण और फटाफट फैसला। वैसे भी कहा जाता है कि न्याय मिलने में यदि विलम्ब हो तो वह न्याय नहीं रह जाता। इन्हें रख लिया तो न्यायालय के पेंडिंग केस भी खत्म हो जाएंगे। डाक्टरी मुलाहिजे की औपचारिकता भी खत्म हो जाएगी। आखिर सब लाइसेंस का ही तो खेल है। दरअसल, इस मामले को राजनीतिक रंग देने की एक बड़ी वजह है। देश संसद में मणिपुर के हालात को लेकर सवाल पूछ रहा है। वहां कोई जवाब देने को तैयार नहीं है। केन्द्र को लगता है कि मामले पर तबतक चुप्पी साधे रहना चाहिए जब तक कोई दूसरा उससे भी गर्म मामला सामने नहीं आ जाता। मामला उतना या उससे ज्यादा गर्म नहीं भी हुआ तो उसे गर्म करने के लिए इंडक्शन से लेकर माइक्रोवेव तक का इंतजाम है। सोशल मीडिया सेल आखिर किस मर्ज की दवा है। वह किसी भी घटना के साथ नया-पुराना इतिहास जोड़कर इतने विश्वसीय ढंग से उसे प्रस्तुत कर सकता है कि देश की अपढ़-कुपढ़ जनता उसपर झट यकीन कर लेगी। और फिर पालतू मीडिया तो है ही, जो घटना को मनचाही दिशा दे सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री सिंह की चुप्पी को लेकर उनपर काफी फब्तियां कसी गईं। पर ऐसी घटनाओं पर कोई कहे भी तो क्या कहे। लगभग सभी राज्यों में महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध होते हैं। समाज भी मूकदर्शक बनकर इसके मजे लेता है। कुछ सभ्य लोग इन घटनाओं में भी टीआरपी ढूंढते हैं।

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Om Prakash Verma July 28, 2023
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