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Gustakhi Maaf: क्योंकि संविधान इसकी इजाजत नहीं देता

By Om Prakash Verma Published January 3, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
देश के संविधान की नजर में हमारी सबकी पहचान एक ही है. भारतीय नागरिक. हमारा झंडा एक है, राष्ट्रगीत भी एक है, राष्ट्रगान भी एक ही है. राष्ट्रीय पशु, पक्षी, फूल और फल भी एक है. हमारी केवल भाषा अलग-अलग है और हम भिन्न-भिन्न राज्यों से आते हैं. पर ये सभी राज्य और भाषाएं भारत की हैं. हम मंदिर जाते हैं, मस्जिद जाते हैं, चर्च जाते हैं या गुरुद्वारा, इससे हमारी पहचान नहीं की जा सकती. यह हमारी व्यक्तिगत आस्था का प्रश्न है. यहां तक कि हमारे राज्य और हमारी भाषा भी हमारी पहचान नहीं है. हम केवल भारतीय हैं. यही हमारी पहचान है. वैसे देश के भीतर हम अपने आपको भारतीय कम ही कहते हैं. इसकी जरूरत भी नहीं पड़ती. इसलिए यहां हम अपने-अपने राज्यों के नाम से भी जाने जाते हैं. दोस्तों के बीच हम एक दूसरे को बंगाली, बिहारी, मराठी, सरदार कह सकते हैं, कहते हैं पर यदि उसे इसपर आपत्ति हो तो तत्काल माफी मांग कर बात को खत्म कर देना चाहिए. छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी यही हुआ. विधायक चाहे किसी भी पार्टी के हों, आपस में अच्छे दोस्त भी होते हैं. पर दोस्तों के बीच जिस भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, उसका उपयोग कदाचित विधानसभा में नहीं किया जाना चाहिए. विधानसभा में वे अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र से ज्यादा अपने-अपने दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इनकी अपनी-अपनी पार्टी लाइन होती है. कब, कौन, किस बात का बुरा मान जाएगा, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. इसलिए वाणी पर संयम बेहद जरूरी होता है. इस बार सिख समाज ने बुरा माना. जिसकी गलती थी उसने और जिसकी गलती नहीं थी उसने भी लिखित में माफी मांग ली. “आपको बुरा लगा, हम माफी मांगते हैं. हमारी मंशा आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने की नहीं थी. हमारे दिल में आपके लिए बहुत सम्मान है.”- बस इतनी सी बात थी. समय पर माफी मांग ली गई और मुद्दा शांत हो गया. कुछ समय पहले तक सभी दलों के नेता इफ्तार की दावत खाया करते थे. रावणदहन के कार्यक्रम में भी सभी पंथ के लोग शामिल होते थे. गुरुद्वारे में साथ-साथ अरदास करते थे. पर उनकी यह कवायद देश को कोई संदेश नहीं दे पाई. वक्त ऐसा बदला कि अब लोग झटका और हलाल में फर्क करने लगे हैं. दरअसल, इसकी बुनियाद में हमारी शिक्षा व्यवस्था है. स्कूल में बच्चे का दाखिला कराते समय जन्मतिथि, माता-पिता के नाम और पता के साथ ही जाति भी दर्शाना होता है. यहां मनुष्य जाति हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के रूप में बंट जाती है. शांतिकाल में तो हम इन शब्दों का उपयोग हूबहू कर सकते हैं पर जैसे ही कोई विवाद खड़ा होता है, हमारी जुबान तालू से चिपक जाती है. फिर हम बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाली भाषा बोलना शुरू कर देते हैं. सवाल यह उठता है कि – “मैं भारतीय, तू भी भारतीय, फिर अल्पसंख्यक कौन?”

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