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Gustakhi Maaf: यूपी में बाबा तो छत्तीसगढ़ में का-बा?

By Om Prakash Verma
Published: January 2, 2023
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gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
gustakhi Maaf: जब दुर्गवासी पी गए लाश वाला पानी
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-दीपक रंजन दास
यूपी के बाबा के बारे में तो सभी ने सुन रखा है. पर छत्तीसगढ़ में भी एक बाबा हैं. यूपी के बाबा का नाम सुनते ही अपराधी और पुलिस की सांसें अटक जाती हैं. पर हमारे सीजी के बाबा के साथ ऐसा नहीं है. आजकल वे वैराग्य के मूड में हैं. वैसे वैराग्य जीवन में कई बार प्रकट होता है. एक बार शैशवावस्था में जब लोग उसे रोक लेते हैं. दूसरी बार कर्मजीवन में वैराग्य का भाव आता है जब लोग बार-बार नौकरी-घर-द्वार छोड़कर कहीं चले जाने की बाते करते हैं. तीसरी बार वैराग्य साठ साल के आसपास जोर मारता है. पर तब तक बंदे को परिवार की ऐसी आदत पड़ जाती है कि वह तो कंबल छोड़ना चाहता है पर कंबल ही उसे नहीं छोड़ता. बचपन में जब लोग विवेकानंद की तस्वीर देखते हैं, दादा दादी से महापुरुषों के किस्से सुनते हैं तो उनका भी मन मचल जाता है. उपनयन (जनेऊ) संस्कार के दौरान भी एक चरण आता है जब बटुक घर-द्वार छोड़कर भाग जाना चाहता है. यहां मामा का बड़ा रोल होता है. वह उसे पकड़ कर ले आते हैं और वह संन्यासी बनने से बच जाता है. गृहस्थी की किचकिच भी कभी-कभी वैराग्य भाव पैदा करती है. बर्तनों का रोज-रोज टकराना-बजना व्यक्ति को विरक्त कर देता है. पर परिवार की जिम्मेदारी उसे रोक लेती है. आगे का हाल तो सबको मालूम ही है. पर्याप्त कमा चुके लोग समय से पहले वालंटरी रिटायरमेंट ले लेते हैं. मुक्तिधाम में जलती चिता को देखकर भी मन में सवाल उठ सकता है कि जीवन का कुल निचोड़ क्या है? जो लोग कांधे पर रखकर यहां तक ले आए अब वे आपस में हंसी ठिठोली कर रहे हैं. पंडित अपना काम कर रहा है और मुखाग्नि देने वाला संस्कारों को सम्पन्न कर रहा है. इसे देखकर एकाएक संसार के प्रति वितृष्णा के भाव जाग जाते हैं. सबकुछ छोड़-छाड़कर पलायन कर जाने का मन करता है. इसी को श्मशान वैराग्य कहा गया है. छत्तीसगढ़ के बाबा ने भी एक लंबा कार्यकाल पूरी निष्ठा के साथ पूरा किया है. पर राजनीति के गलियारों में श्रम, समय और तनाव बहुत है. ऊर्जा भी बहुत लगती है. अकसर हासिल कुछ नहीं आता. उनके मुंह से निकल गया कि अब पहले की तरह ऊर्जा के साथ चुनावी मैदान में उतरने की इच्छा नहीं है. लोगों को इसकी वजह भी बाबा से ही पूछनी चाहिए थी. पर अपनी मीडिया इतनी भोली नहीं है. वह बाबा की स्वगतोक्ति का मतलब किसी दूसरे कद्दावर नेता से निकलवाती है. टका सा जवाब भी मिल जाता है. यह हुई न बात! अब बाबा बनाम नेता का नया मुद्दा खड़ा हो गया. अब इस आग में घी डालने का काम अपने आप होता रहेगा. लोग स्वयमेव आगे आएंगे और हवन कुंड में समिधा देंगे. इस तरह न केवल मुद्दा जिंदा रहेगा बल्कि टीआरपी भी बनी रहेगी. बाबा अपना सिर पीटेंगे और बड़े नेता मुंह छिपाएंगे.

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