-दीपक रंजन दास
हम तो इसी मुगालते में जी रहे थे कि सरकारी नौकरी मतलब लाइफ सेट. दुनिया इधर की उधर हो जाए, नियत तारीख पर बंधी-बंधाई तनख्वाह मिल ही जाती है. महंगाई के बराबर न सही, पर महंगाई भत्ता तो मिलता है. अन्य भत्ते भी मिलते हैं. एक बार भर्ती हो गए तो योग्य हों या अयोग्य, वेतन बढ़ता जाता है. निजी अस्पतालों में भी सस्ता इलाज मिलता है. सरकारी नौकरी मिलते ही सिबिल स्कोर बढ़ जाता है. आसान किस्तों पर सभी प्रकार के लोन मिल जाते हैं. कमाई इतनी होती है कि टैक्स बचाने के लिए तरह-तरह के निवेश करने पड़ते हैं. प्रत्येक तीज-त्यौहार पर बंधी-बंधाई छुट्टियां मिलती हैं. ब्याह-शादी के बाजार में अच्छी पूछ परख होती है. एबड़ा-खेबड़ा लड़का भी सरकारी नौकरी के दम पर सुन्दर-सुशील पत्नी हासिल कर लेता है. हम देखते थे कि सरकार में चपरासी पद पर भर्ती होने के लिए इंजीनियर तक आवेदन लगा देते हैं. छोटे-छोटे पदों के लिए भारी-भरकम रिश्वत देने को तैयार रहते हैं. सरकारी नौकरी का रुतबा ही अलग होता है जनाब. सरकार का आदमी होने के अलग ही मजे हैं. वह आम नागरिक के साथ बदतमीजी कर सकता है, उसका जीवन नष्ट कर सकता है, पर क्या मजाल जो कोई आम आदमी उसका कॉलर भी पकड़ ले. सरकारें अपने कर्मचारियों का पूरा-पूरा ख्याल रखती हैं. शायद यह सरकारों की आत्मग्लानि की उपज है. सरकारों को पता है कि सभी न सही पर अधिकांश मुसीबतों की जड़ में उसकी अपनी नीतियां हैं. पर कहावत है – ‘फोकट के मिले तो मरत ले खायÓ. सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाला यह दामाद सरीखा ट्रीटमेंट ही सरकारों की नाक में दम किये हुये है. करके दिखाए कोई एमएनसी में हड़ताल. खड़े पैर नौकरी न चली जाए तो कहना. देश की शीर्ष सेवा, सेना में भी कोर्ट मार्शल होता है. पर सरकारी कर्मचारी को केवल कारण बताओ नोटिस मिलता है. ज्यादा से ज्यादा उसका सीआर खराब हो जाता है. उसे बर्खास्त करना लंका जीतने से ज्यादा कठिन है. देश की लगभग सभी सरकारें घाटे में चल रही हैं. सरकारी खर्च का एक बड़ा हिस्सा अपने कर्मचारियों का वेतन और पेंशन है. केन्द्र की बात करें तो जीडीपी का 8 फीसद से ज्यादा वेतन पर और राजस्व व्यय का 6.8 फीसद सरकारी कर्मचारियों के पेंशन पर खर्च हो जाता है. इसके मुकाबले पूरे देश की शिक्षा पर जीडीपी का 3.3 फीसद और स्वास्थ्य पर 1.3 फीसद खर्च किया जाता है. पड़ोसी देश चीन शिक्षा पर 4 और स्वास्थ्य पर 5.5 फीसद खर्च करता है. जैसे-जैसे नए राज्य और नए जिले बनते जाते हैं, वैसे-वैसे यह खर्च भी बढ़ता चला जाता है. यही कारण है कि सरकारें अपने रिक्त पदों पर नियुक्तियां नहीं कर रहीं और एक-एक कर अधिकांश सेवाओं की आउटसोर्सिंग कर रही है. समय रहते चेत गए तो अच्छा, वरना उनकी औलादें भी 10-12 हजार की प्रायवेट नौकरी करती मिलेगी.
गुस्ताखी माफ: इतनी तकलीफ में जी रहे सरकारी मुलाजिम




