-दीपक रंजन दास
ओहदा का मतलब सिर्फ बड़ा दफ्तर और घूमने वाली कुर्सी नहीं होती। ऐसे कर्मचारियों/अधिकारियों पर जिम्मेदारी भी ज्यादा होनी चाहिए। जारी सप्ताह में छत्तीसगढ़ में हुई दो घटनाओं ने इसका तगड़ा इशारा किया है। मंदिरहसौद के हायर सेकण्डरी स्कूल में प्राचार्य समेत 11 लोग समय पर ड्यूटी नहीं पहुंचे थे। उनकी अनुपस्थिति में स्कूल शिक्षा सचिव स्कूल पहुंच गए। उन्होंने हाल-चाल देखा। बच्चों की पढ़ाई लिखाई की प्रगति देखी और यह भी देखा कि नि:शुल्क वितरण के लिए आई पुस्तकें एक कमरे में डंप पड़ी हैं। उन्होंने तत्काल जिम्मेदारी तय कर दी। लेट आने वालों की आधे दिन की तनख्वाह काटने के निर्देश दिए। अनुपस्थित शिक्षकों की एक वेतन वृद्धि रोक दी। स्कूल के सही संचालन के लिए जिम्मेदार प्राचार्य की दो वेतन वृद्धि रोकने के आदेश दिए। दूसरी सख्ती उच्च न्यायालय ने दिखाई। 45 बार वारंट जारी करने के बाद भी एक सब इंसपेक्टर गवाही देने कोर्ट नहीं आ रहा था। नाराज कोर्ट ने चार आईपीएस अफसरों को समन भेज दिया। पढऩे सुनने में तो अच्छा लगता है कि जिम्मेदारों को घसीटा गया पर वास्तविकता यही है। सरकारी नौकरी मिल जाने के बाद लोगों के पर निकल आते हैं। उन्हें अपनी जिम्मेदारियों से ज्यादा अपने अधिकारों का पता होता है। सरकारी अधिकारी अपना काम करे या न करे, उसकी मर्जी। वह आम आदमी को सताए, उससे बदतमीजी करे तो कोई बात नहीं पर यदि जनता ने उसे उसका काम सिखाने की कोशिश की तो उसपर सरकारी कामकाज में व्यवधान उत्पन्न करने का मामला दर्ज हो सकता है। बदतमीज सरकारी आदमी अपने अधिकारी तक को नहीं बख्शता। उसे पता है कि विभागीय अधिकारी उसका ज्यादा कुछ बिगाड़ नहीं सकता। वैसे भी प्रदेश में खेती किसानी का सीजन चल रहा है। शिक्षक तो शिक्षक, बच्चे भी खेती किसानी में हाथ बंटाने के लिए शाला से गायब हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अकसर यही होता आया है। पर इसके चलते सरकारी स्कूलों में शिक्षा बाधित होती है। सरकार की तमाम महत्वाकांक्षाएं और योजनाएं धराशायी हो जाती हैं। पहले खेती किसानी और फिर तीज त्यौहार। पढ़ाई के नाम पर सिर्फ लीपापोती ही हो पाती है। जिस कारण से लोग नौकरियों से गायब होते हैं, अगर उसमें मुनाफा ज्यादा हो तो आधे दिन की छुट्टी या वेतन वृद्धि रोके जाने का कोई खास फर्क नहीं पड़ता। बस नौकरी सलामत रहनी चाहिए। लोगों की सरकारी नौकरी सलामत रहे, इसके लिए एक पूरी मशीनरी पहले से तय है। सालों निलंबित रहने के बाद भी वह पूरे लाभ के साथ दोबारा काम पर लौट आता है। अब इसपर अंकुश लगाने का वक्त आ गया है। सेना की तरह 4-4 साल की भर्ती न भी संभव हो सके तो नौकरी से सीधे बर्खास्त किये जाने का प्रावधान होना चाहिए। बिना ‘दांत-नख’ का अधिकारी किसी से काम ले भी तो कैसे?





