-दीपक रंजन दास
जात-पात और छुआछूत के खिलाफ भारत सदियों से संघर्ष कर रहा है। पर यह समस्या ऐसी है कि इसके बंधन खुलने के बजाय नागपाश की तरह सख्त होते जा रहे हैं। लोकतंत्र की स्थापना के बाद से ही देश समाजों में बंटता चला गया। वोट बैंक की राजनीति ने इस आग में घी का काम किया। हर साल सैकड़ों की संख्या में नए समाजों का पंजीयन होता है। ये समाज पहले भवन के लिए जमीन मांगते हैं और फिर जातीय आधार पर राजनीति में अपनी हिस्सेदारी। शिक्षा, आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण जैसे शब्द जाति प्रथा के आगे बौने साबित होते हैं। जो साहसी होते हैं, वे समाज के कथित ठेकेदारों को नजरअंदाज करते हैं, बहिष्कार भी सह लेते हैं पर जब बात उनके मानवाधिकारी की आती है तो वे डटकर समाज का सामना भी करते हैं। इस संघर्ष में अब तक हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं। एक ऐसे ही मामले में अब एक प्राचार्य ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हाईकोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामला प्राचार्य के पुत्र के विवाह से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि यह विवाह अंतर्जातीय है। पढ़े लिखे लोगों को पता होगा कि सभी मनुष्य एक ही जाति में आते हैं, इनकी प्रजातियां भिन्न भिन्न होती हैं। सनातन धर्म भी मानव योनि की ही बात करता है। पाप-पुण्य के आधार पर लोग मानव योनि से अन्य योनियों में जाते हैं। कोई सुअर बनता है तो कोई चींटी, कोई कुत्ता बनता है तो कोई बिल्ली। कर्म के अनुसार लोग वर्गों में बंटे। ब्राह्मण कुल में जन्मे परशुराम क्षत्रियों के आराध्य हुए। ब्राह्मण कुल में ही जन्मा रावण राक्षस हुआ और विभीषण सदाचारी राजा। इसे कब गुपचुप जाति व्यवस्था से जोड़ दिया गया, इसका कहीं स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। त्रेता में प्रभु श्रीराम शबरी के झूठे बेर खाते हैं, केवट को मित्र बनाते हैं, वानर और रीछों से संधियां करते हैं। कहां थी तब जाति व्यवस्था? समाज के इन कथित ठेकेदारों ने न केवल बार-बार सनातन को कलंकित किया है बल्कि भारत को कई टुकड़ों में बांटा भी है। दो सुयोग्य बालिग अपने विवाह का फैसला भी नहीं कर सकते? कर सकते हैं और करते भी हैं। जहां तक उनका व्यक्तिगत प्रश्न है तो उन्हें समाज की परवाह भी नहीं होती। पर यही बात उनके परिवार के प्रत्येक सदस्य के बारे में नहीं कही जा सकती। ताजा मामला इसी बात से जुड़ा है। प्राचार्य ने कहा है कि उन्हें समाज में रखें या निकालें, उन्हें घंटा फर्क नहीं पड़ता। पर उनके परिजनों पर अर्थदण्ड लगाना अनुचित है। उनका इस विवाह से कोई लेना देना नहीं है।





