-दीपक रंजन दास
आंखों में कुछ पड़ जाए तो आदमी छटपटा जाता है। आंखों को पहले रगड़ता है, फिर पानी मारता है और तब भी बात न बने तो किसी की मदद लेता है। मदद करने वाला पलकों को फैलाता है और कुछ न दिखाई देने पर उसमें जोर की फूंक मारता है। कभी-कभी यह टोटका काम कर जाता है पर अकसर समस्या बनी रह जाती है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं की आंख में भी कुछ चला गया है। वह बेचारा खुद ही उसे निकालने में लगा है। रगड़ते-रगड़ते आंखें लाल हो गई हैं, पानी के झपाटे भी किरकिरी को निकाल नहीं पा रहे हैं। कोई मदद करने वाला मिल नहीं रहा है। नेता, विधायक सभी बिजी हैं। संगठन के खुद की आंखों का हाल बुरा है। उसे स्वतंत्रता दिवस से पहले कार्यकर्ताओं को भारत जोड़ो पदयात्रा के लिए भीड़ इकठ्ठा करना है। पर बुलाए तो किसे?
हम इतिहास पढ़ते जरूर हैं पर उससे सबक नहीं लेते। महाराज अंधे थे, आंख से भी और दिमाग से भी। फिर महाभारत हुआ और सबकुछ नष्ट हो गया। एक त्रिकालदर्शी-त्रिलोकविजयी सम्राट दिमाग से अंधा था। जिसे जंगल में भटकता भिखारी समझा, वही सोने की लंका जला गया। न तो यह इंद्रप्रस्थ है और न ही समुद्र से घिरी लंका, ये तो लोकतंत्र की नांव है, जरा सा बैलेंस बिगड़ा और सब के सब पानी में। लोकतंत्र में ताकत आपको जनता देती है। यह विरासत में मिली पुश्तैनी जागीर नहीं है जिसे जब चाहा, जिसे चाहा हस्तांतरित कर दिया। भाई, भाभी, बाप, बेटा को आगे बढ़ाना चाहते हो, खूब बढ़ाओ पर अपनी विधायकी इन्हें सौंपने की गुस्ताखी मत करो। कार्यकर्ता पहले ही फुंके बैठे हैं। उनकी अपने मोहल्लों में, अपने दोस्तों के बीच खूब किरकिरी हो रही है। लोग पूछ रहे हैं – क्या मिला, बाबाजी का ठुल्लू? एक नाली तक तो साफ करवाने की औकात नहीं बना पाए।
कार्यकर्ता ही क्यों, विधायकजी तो पार्षदों तक को उपलब्ध नहीं हैं। राजपाट बेटे को सौंप कर राजधानी मे जा बैठे हैं। दरबान से कह रखा है कि किसी को भी अंदर नहीं आने देना। आवेदन गेट पर रखवा लो, समय मिलेगा तो देख लेंगे। किसी का बेटा, किसी की बीवी पैसों के अभाव में अस्पताल में दम तोड़ रही है और वह आपसे मदद मांग भी नहीं सकता? क्या वह चिठ्ठी डालकर जवाब का इंतजार कर सकता है? कार्यकर्ता ही क्यों, पार्टी के नेताओं ने संगठन को भी लहूलुहान किया है। जब चाहा, जिसे चाहा, पद सौंप दिया और जब इच्छा हुई वापस ले लिया। ऐसा अपमान तो लोग अपने घरों में भी नहीं सहते। डिमोशन और उपेक्षा एक कड़वी दवा है, मजबूरी न हुई तो लोग नौकरियां तक छोड़ देते हैं। सत्ता बड़ी बेवफा होती है, जाने कब पाला बदल ले। अच्छा सिपहसालार बनें और सेना को हमेशा तैयार रखें। अभी तलवार को म्यान में रखने का वक्त नहीं आया।




