भिलाई। प्रदेश में सत्ता न हो और क्षेत्र भी मुख्यमंत्री का हो तो विरोधी दल के हौसले वैसे ही पस्त हो जाते है। इस पर जमीनी कार्यकर्ताओं का साथ न मिले तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भावी नतीजे क्या होंगे? नामांकन दाखिले के अंतिम दिन शुक्रवार को भिलाई-3 चरोदा नगर निगम के ज्यादातर पार्षद प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं ने अपने नेताओं को गच्चा दे दिया। यहां चुनाव प्रभारी बनाए गए पूर्व मंत्री व कद्दावर नेता बृजमोहन अग्रवाल सभी 40 प्रत्याशियों को साथ लेकर नामांकन रैली करना चाहते थे, किन्तु उनकी रैली में महज 6 ही प्रत्याशी और दर्जनभर कार्यकर्ता ही पहुंचे। पार्टी के भीतर इसे टिकट वितरण की नाराजगी से जोड़कर देखा जा रहा है। कहा जा रहा है कि दीगर वार्ड के लोगों को टिकट देने से स्थानीय कार्यकर्ताओं में बेहद आक्रोश है। दूसरी ओर कांग्रेस ने इस क्षेत्र से बतौर चुनाव प्रभारी मो. अकबर को मैदान में उतारा है, जिन्हें चुनाव प्रबंधन के मामले में बृजमोहन की ही टक्कर का रणनीतिकार माना जाता है।

भिलाई-3 चरोदा नगर निगम क्षेत्र के भाजपाइयों में टिकट वितरण की नाराजगी खुलकर सामने आ गई है। आरोप लग रहे हैं कि पार्टी ने स्थानीय प्रत्याशियों को उतारने का वायदा किया था, किन्तु टिकट वितरण में इस सबसे अहम् मसले की अनदेखी कर दी गई। टिकट दावेदारों का आरोप है कि पार्टी ने बाहरी और अयोग्य लोगों को टिकट दी है। ऐसे लोगों के चुनाव जीतने की संभावनाएं काफी कम है। इधर, नाराज कार्यकर्ताओं ने बतौर निर्दलीय चुनाव लडऩे का भी निर्णय किया और अंतिम दिन शुक्रवार को नामांकन दाखिल किया। पार्टी स्तर पर ऐसे लोगों को समझाइश दी जा रही है। नाम वापसी 6 दिसम्बर को होगी। पार्टी के नेता चाह रहे हैं कि जिन्हें भी वार्ड प्रत्याशी घोषित किया गया है, उनकी जीत के लिए कार्यकर्ता जुट जाएं। हालांकि नेताओं के प्रति नाराजगी का आलम यह है कि कार्यकर्ता अपने अपने घरों में बैठे हैं। इससे घोषित प्रत्याशियों के खिलाफ भीतरघात की संभावनाएं भी बढ़ गई है।
बताया जाता है कि चुनाव प्रबंधन में माहिर पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल चाहते थे कि कैडर और मतदाताओं को यह संदेश जाए कि पार्टी के नेता व कार्यकर्ता एकजुट हैं। इसी आधार पर आगे की व्यूह रचना की गई थी। किन्तु उनका प्रारंभिक व्यूह ही नाकाम रहा। गौरतलब है कि भाजपा ने पिछले नगर निगम चुनाव के दौरान भी बृजमोहन को भिलाई-3 चरोदा नगर निगम का प्रभारी बनाया था। हालांकि उस वक्त प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और बृजमोहन कद्दावर मंत्री थे। वे रोजाना देररात आते थे और कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर चले जाते थे। उनके बेहतर चुनाव प्रबंधन का ही नतीजा था कि भाजपा प्रत्याशी चंद्रकांता मांडले महापौर बनने में कामयाब रही, जबकि उस वक्त चहुंओर कहा जा रहा था कि कांग्रेस प्रत्याशी सीता साहू चुनाव जीत रही है। नतीजों के बाद कांग्रेसियों को इस बात का भरोसा ही नहीं हो रहा था कि वे चुनाव हार चुके हैं। मजेदार बात तो यह है कि बृजमोहन ने जो नामांकन रैली निकाली, उसमें स्वयं चंद्रकांता मांडले भी शामिल नहीं हुईं, जबकि उन्हें पार्टी की ओर से महापौर का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। रैली के दौरान बृजमोहन के साथ पार्टी के ही कद्दावर नेता शिवरतन शर्मा भी मौजूद थे।
इधर, चुनाव प्रक्रिया प्रारम्भ होने के साथ ही जीत-हार के कयास लगने भी शुरू हो गए हैं। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का क्षेत्र और चुनाव की कमान मोहम्मद अकबर जैसे मंझे हुए और काबिल हाथों में होने, भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी, आयातीत प्रत्याशी देने समेत कई ऐसी वजहें गिनवाई जा रही हैं, जो भाजपा के लिए शुभ नहीं है। भाजपा के स्थानीय नेता पार्टी का सूपड़ा साफ होने की बात कह रहे हैं।




