-दीपक रंजन दास
आज भी सड़कों पर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली ही स्थिति है। थक-हारकर पुलिस ने एक अंतिम कोशिश की है। यातायात पुलिस ने स्कूली शिक्षकों को ट्रैफिक के नियमों की जानकारी देने के साथ ही उन्हें लाइसेंस, बीमा और हेलमेट का महत्व समझाया है। ट्रैफिक पुलिस यह मानकर चल रही है कि शिक्षक सीखेगा तो बच्चों को सिखाएगा। पर जो नहीं समझाया या सिखाया जा सकता, वो है ट्रैफिक सेंस। सामुदायिक सोच और सहिष्णुता इसका आधार है। जिस दिन आप यह महसूस करने लगेंगे कि सड़क पर और भी लोगों का अधिकार है यह समस्या खत्म होने लगेगी। दरअसल सबने मिलकर एक धारणा बना ली है कि सड़क हादसों के लिए सिर्फ तेज रफ्तार जिम्मेदार है। हम मान लेते हैं कि स्कूटर-कार की टक्कर में कार वाला, कार-ट्रक की दुर्घटना में ट्रक वाला जिम्मेदार है। दरअसल हकीकत इससे ठीक उलट है। अगर हम यह कहें कि सड़क पर धीरे चलने वाले हादसों का कारण बनते हैं, तो सहसा कोई इसपर यकीन नहीं करेगा। पर हकीकत यही है कि सड़क पर बहुत धीरे चलने वाले ही अपने पीछे आने वाले वाहनों को ओवरटेकिंग के लिए मजबूर करते हैं। ओवरटेकिंग सड़क हादसों का एक बड़ा कारण है। कुछ लोग कार में बैठते ही फोन पर लग जाते हैं। अधिकांश ऐसे लोगों की गाडिय़ां सड़क पर रेंगती हैं। दूसरी समस्या है चौड़ी सड़कें। लोगों को लेन समझ में नहीं आता। बिना इंडीकेटर दिए सड़क पर सांप की तरह चलते हैं, दायें बायें से ओवरटेक करते हैं। तीसरे और सबसे खतरनाक लोग वो होते हैं जिनका टाइम मैनेजमेंट अच्छा नहीं होता। ऐसे लोग देर से निकलते हैं और जल्दी पहुंचना चाहते हैं। यदि एक्सीडेंट रोकना है तो इन बातों पर ध्यान देना होगा। हेलमेट और बीमा तो हादसा होने के बाद नुकसान को कम करने के साधन मात्र हैं।
बात का बतंगड़: हेलमेट, बीमा और ट्रैफिक सेंस




